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गृह मंदिर📜 वास्तु शास्त्र, शिल्पशास्त्र, धर्मसिन्धु, आगम शास्त्र, लोक परम्परा3 मिनट पठन

घर के मंदिर में मूर्ति का आकार कितना होना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

9 अंगुल (6-9 इंच): शास्त्रीय अधिकतम। छोटा मंदिर: 3-6 इंच। शिवलिंग: अंगूठे के बराबर (1-2 इंच)। ऊँचाई: हृदय स्तर। 24 इंच से बड़ी घर में वर्जित। बैठी/आशीर्वाद मुद्रा। खंडित/नटराज न रखें। कारण: बड़ी मूर्ति = जटिल पूजा नियम।

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विस्तृत उत्तर

घर के मंदिर में रखी जाने वाली देवी-देवताओं की मूर्तियों के आकार के विषय में वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र में स्पष्ट नियम बताए गए हैं।

शास्त्रीय नियम

1नौ अंगुल (9 अंगुल) का नियम

शिल्पशास्त्र और वास्तु परम्परा के अनुसार घर में रखी जाने वाली मूर्तियाँ 9 अंगुल (लगभग 6-9 इंच) से अधिक ऊँची नहीं होनी चाहिए। यह सबसे प्रचलित और मान्य नियम है।

2आकार के प्रकार (मंदिर स्थान अनुसार)

  • छोटा गृह मंदिर: 3 से 6 इंच की मूर्तियाँ — सर्वोत्तम
  • मध्यम/बड़ा पूजा कक्ष: 9 से 12 इंच — स्वीकार्य (कुछ परम्पराओं में 18 इंच तक)
  • अधिकतम सीमा: 24 इंच से बड़ी मूर्ति घर में कदापि नहीं — बड़ी मूर्तियाँ केवल सार्वजनिक मंदिरों के लिए

3शिवलिंग का विशेष नियम

घर में रखा जाने वाला शिवलिंग अंगूठे के आकार (1-2 इंच) से बड़ा नहीं होना चाहिए। शिवलिंग अत्यन्त ऊर्जावान होता है — बड़ा शिवलिंग गृहस्थ वातावरण के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।

4मूर्ति की स्थापना ऊँचाई

  • मूर्ति हृदय (Heart Level) की ऊँचाई पर रखें
  • बैठकर पूजा करें तो बैठने पर हृदय स्तर
  • खड़े होकर पूजा करें तो खड़े होने पर हृदय स्तर
  • मूर्ति इतनी ऊँची न हो कि ऊपर देखना पड़े, न इतनी नीची कि नीचे झुकना पड़े

5अन्य महत्वपूर्ण नियम

  • मूर्ति बैठी मुद्रा या आशीर्वाद मुद्रा में हो — उग्र/क्रोधित मुद्रा न हो
  • खंडित, दरार वाली, या चटकी हुई मूर्ति न रखें
  • मूर्ति को दीवार से सटाकर न रखें — कुछ दूरी रखें
  • पीतल, ताँबा, चाँदी, सोना, संगमरमर, अष्टधातु — उत्तम धातुएँ
  • मिट्टी की मूर्ति स्थायी पूजा के लिए अनुशंसित नहीं (विसर्जन योग्य)
  • नटराज (तांडव मुद्रा) शिव की मूर्ति घर में न रखें — कलह का कारण

6मूर्तियों की संख्या

  • घर में अत्यधिक मूर्तियाँ न रखें — सबकी विधिवत पूजा कठिन
  • इष्ट देव/देवी की मूर्ति प्रधान रखें
  • कुछ विद्वान 1-3 मूर्तियाँ ही अनुशंसित करते हैं

कारण

बड़ी मूर्तियों की पूजा में अनेक नियम पालने होते हैं — नित्य अभिषेक, वस्त्र परिवर्तन, विस्तृत भोग आदि। यदि इनमें त्रुटि हो तो दोष लगता है। छोटी मूर्ति = सरल पूजा, कम दोष।

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शास्त्रीय स्रोत
वास्तु शास्त्र, शिल्पशास्त्र, धर्मसिन्धु, आगम शास्त्र, लोक परम्परा
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