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पूजा स्थान📜 वास्तु शास्त्र, धर्म सिंधु — पूजा गृह, मत्स्य पुराण2 मिनट पठन

घर में मंदिर कहाँ होना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

घर में मंदिर: ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) — सर्वोत्तम। मूर्ति का मुख पूर्व या पश्चिम में। पूजक का मुख पूर्व या उत्तर। मूर्ति चौकी पर रखें, भूमि पर नहीं। दक्षिण दिशा और शयन कक्ष में मंदिर उचित नहीं।

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विस्तृत उत्तर

घर में मंदिर के स्थान का वर्णन वास्तु शास्त्र और धर्म सिंधु में मिलता है:

सर्वोत्तम दिशा — ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)

वास्तु शास्त्र में ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को देव स्थान कहा गया है। यह दिशा शिव और देवताओं की मानी जाती है। यहाँ सूर्य की प्रातःकालीन किरणें पड़ती हैं — जो पवित्र और ऊर्जादायक हैं।

पूजा कक्ष के नियम

  1. 1मूर्ति का मुख पूर्व या पश्चिम दिशा में हो
  2. 2पूजा करते समय पूर्व मुख — या उत्तर मुख
  3. 3मूर्ति भूमि पर न रखें — चौकी या आसन पर
  4. 4मूर्ति की ऊँचाई साधक के नाभि से ऊपर हो
  5. 5पूजा कक्ष में शयन न करें
  6. 6पूजा कक्ष स्वच्छ और सुव्यवस्थित हो

क्या न करें

  1. 1दक्षिण दिशा में मंदिर न बनाएं (यम की दिशा)
  2. 2शयन कक्ष में मंदिर उचित नहीं
  3. 3शौचालय के बगल में मंदिर नहीं
  4. 4खंडित मूर्ति न रखें

मत्स्य पुराण

घर में पूजा स्थान बनाना अत्यंत शुभ है। जिस घर में नित्य देव पूजा होती है, उसमें सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।

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शास्त्रीय स्रोत
वास्तु शास्त्र, धर्म सिंधु — पूजा गृह, मत्स्य पुराण
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