विस्तृत उत्तर
घर में मंदिर के स्थान का वर्णन वास्तु शास्त्र और धर्म सिंधु में मिलता है:
सर्वोत्तम दिशा — ईशान कोण (उत्तर-पूर्व)
वास्तु शास्त्र में ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को देव स्थान कहा गया है। यह दिशा शिव और देवताओं की मानी जाती है। यहाँ सूर्य की प्रातःकालीन किरणें पड़ती हैं — जो पवित्र और ऊर्जादायक हैं।
पूजा कक्ष के नियम
- 1मूर्ति का मुख पूर्व या पश्चिम दिशा में हो
- 2पूजा करते समय पूर्व मुख — या उत्तर मुख
- 3मूर्ति भूमि पर न रखें — चौकी या आसन पर
- 4मूर्ति की ऊँचाई साधक के नाभि से ऊपर हो
- 5पूजा कक्ष में शयन न करें
- 6पूजा कक्ष स्वच्छ और सुव्यवस्थित हो
क्या न करें
- 1दक्षिण दिशा में मंदिर न बनाएं (यम की दिशा)
- 2शयन कक्ष में मंदिर उचित नहीं
- 3शौचालय के बगल में मंदिर नहीं
- 4खंडित मूर्ति न रखें
मत्स्य पुराण
घर में पूजा स्थान बनाना अत्यंत शुभ है। जिस घर में नित्य देव पूजा होती है, उसमें सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।





