विस्तृत उत्तर
तांत्रिक दर्शन के अनुसार, भैरव (शिव) और भैरवी (शक्ति) अविभाज्य हैं। भैरव यदि परम चेतना हैं, तो भैरवी उनकी क्रियात्मक ऊर्जा है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं है।
एक साधारण मनुष्य, जो माया के आवरण में रहता है, भैरव की परम, निर्गुण चेतना को सीधे तौर पर नहीं समझ सकता।
यहाँ 'ह्रीं' मंत्र एक सेतु का काम करता है। 'ह्रीं' का जाप करके, साधक सीधे भैरव तक पहुँचने का प्रयास नहीं कर रहा है। इसके बजाय, वह भैरवी, उनकी आंतरिक शक्ति (शक्ति) का आह्वान कर रहा है। यह 'माया बीज' का उपयोग माया को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उस शक्ति को जागृत करने के लिए है जो माया को नियंत्रित करती है।
यह भैरवी की कृपा से भैरव को देखने और अनुभव करने का तांत्रिक मार्ग है। आप शक्ति का आह्वान करते हैं ताकि आप शक्तिमान को देख सकें।





