विस्तृत उत्तर
हिंदू दर्शन और वेदांत के अनुसार कर्म ही बड़ा है, क्योंकि भाग्य स्वयं कर्म का ही एक रूप है। जो हम आज भाग्य कहते हैं, वह कल के किसी कर्म का फल है। इसलिए मूल में कर्म ही है।
शास्त्रीय दृष्टि से देखें तो — संचित कर्म (पूर्व जन्मों का संग्रह) ही प्रारब्ध (इस जन्म का भाग्य) बनता है। और क्रियमाण कर्म (वर्तमान कर्म) आगे का संचित बनाते हैं। इस प्रकार कर्म ही भाग्य का बीज है और भाग्य कर्म का वृक्ष। बीज बड़ा होता है क्योंकि वही वृक्ष को जन्म देता है।
महाभारत के अनुशासनपर्व में स्पष्ट कहा गया है — 'कथं कर्म विना दैवं स्थास्यति स्थापयिष्यति' — कर्म के बिना भाग्य खुद कैसे बनेगा और कैसे टिकेगा? यह श्लोक यही बताता है कि भाग्य की नींव कर्म है।
इसके साथ ही यह भी सत्य है कि एक बार जो प्रारब्ध बन जाता है, उसे पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। कुछ बातें निश्चित हैं — जन्म, मृत्यु, परिवार का आरंभिक वातावरण — ये प्रारब्धाधीन हैं। परंतु उन परिस्थितियों में जीवन कैसे जिया जाए, यह कर्म और पुरुषार्थ तय करते हैं।
संत और विद्वान यही कहते आए हैं कि भाग्य को कोसने से कुछ नहीं बदलता, परंतु कर्म बदलने से भाग्य बदलता है। भाग्यवाद आलस्य का दूसरा नाम है — यह शास्त्रों की भावना नहीं है।





