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विस्तृत उत्तर
क्षत्रिय का धर्म प्रजा-रक्षा, साहस, न्याय और धर्मपालन है। मनुस्मृति के अनुसार, जब क्षत्रिय प्रजा-रक्षा का त्याग करता है, कायरता दिखाता है, निर्दयी बनता है और धर्म से च्युत होता है, तो वह कटपूतन प्रेत बनता है। कटपूतन के नासिका छिद्रों से भयंकर दुर्गंध आती है। वह अशुद्ध पदार्थों और मृत शरीरों का भक्षण करता है तथा श्मशानों में भटकता है। यह अवस्था क्षत्रिय धर्म के पतन का कर्म-विपाक है।
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