विस्तृत उत्तर
कुक्कुटेश्वर लिंग का दुर्गा कुण्ड के दक्षिणी द्वार पर स्थित होना एक विशिष्ट तांत्रिक अर्थ रखता है। दुर्गा मंदिर एक सिद्ध शाक्त-पीठ है जहाँ माँ दुर्गा 'बीसा यंत्र' के रूप में विराजमान हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार जहाँ भी उग्र शाक्त ऊर्जा का केंद्र होता है, वहाँ उस प्रचंड शक्ति को संतुलित करने और साधक को शिव तक पहुँचाने के लिए एक शिव तत्त्व (भैरव या गुप्त लिंग) अनिवार्य होता है। 'दक्षिण' दिशा यम और काल की दिशा है। शक्ति (दुर्गा) के उग्र सान्निध्य में शिव-चेतना (कुक्कुटेश्वर) का जागरण ही शैव-शाक्त अद्वैतवाद का चरम लक्ष्य है। यह भौगोलिक युति दर्शाती है कि शक्ति की उपासना तब तक अपूर्ण है जब तक साधक उस शक्ति के उद्गम शिव (कुक्कुटेश्वर) का साक्षात्कार न कर ले।





