विस्तृत उत्तर
अभ्यास समाप्त होने के बाद, साधक को अश्विनी या वज्र मुद्रा का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।
यह मुद्रा कुंडलिनी योग के सिद्धांतों पर आधारित है, जहाँ ब्रह्मचर्य के पालन में सहायता मिलती है और ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होता है।
इस प्रकार, स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ बाहरी साधना का कार्य करता है, जबकि मुद्रा आंतरिक रूप से ऊर्जा संतुलन और आध्यात्मिक एकता को साधने का कार्य करती है।





