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जप और कर्म📜 भागवत पुराण — नाम महिमा, भगवद् गीता (4.37), विष्णु पुराण2 मिनट पठन

क्या मंत्र जप से कर्म नष्ट होते हैं?

संक्षिप्त उत्तर

हाँ, मंत्र जप से कर्म नष्ट होते हैं। गीता 4.37: 'ज्ञान की अग्नि सभी कर्म भस्म करती है।' भागवत: 'नाम स्मरण से सभी पाप नाश।' संचित कर्म — जप से क्षय; प्रारब्ध — सहने की शक्ति; आगामी — शुभ संस्कार। शर्त: सच्चे मन से + जीवन में परिवर्तन।

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विस्तृत उत्तर

मंत्र जप से कर्म नाश का वर्णन भागवत पुराण और भगवद् गीता में स्पष्ट रूप से है:

भगवद् गीता (4.37)

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।'

— जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म करती है, वैसे ज्ञान की अग्नि (जप-भक्ति) सभी कर्मों को भस्म करती है।

भागवत पुराण — नाम महिमा

नामस्मरणमात्रेण सर्वपापप्रणाशनम्।

— नाम स्मरण मात्र से सभी पाप (संचित कर्म) नष्ट होते हैं।

तीन प्रकार के कर्म और जप

| कर्म प्रकार | जप का प्रभाव |

|------------|---------------|

| संचित (संचित, अभी फल नहीं दिया) | जप से क्षय |

| प्रारब्ध (वर्तमान जीवन में भोगना) | सहन करने की शक्ति मिलती है |

| आगामी (भविष्य के कर्म) | जप के संस्कार से शुभ होते हैं |

विशेष

विष्णु पुराण: 'हरि नाम जप' — एक बार सच्चे मन से — अनेक जन्मों के पाप नष्ट।

शर्त

गीता: 'सच्चे मन से।' पाप करते रहें और जप भी करें — यह नहीं चलेगा। जप के साथ जीवन में परिवर्तन आवश्यक।

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शास्त्रीय स्रोत
भागवत पुराण — नाम महिमा, भगवद् गीता (4.37), विष्णु पुराण
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