विस्तृत उत्तर
मंत्र जप से कर्म नाश का वर्णन भागवत पुराण और भगवद् गीता में स्पष्ट रूप से है:
भगवद् गीता (4.37)
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।'
— जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म करती है, वैसे ज्ञान की अग्नि (जप-भक्ति) सभी कर्मों को भस्म करती है।
भागवत पुराण — नाम महिमा
नामस्मरणमात्रेण सर्वपापप्रणाशनम्।
— नाम स्मरण मात्र से सभी पाप (संचित कर्म) नष्ट होते हैं।
तीन प्रकार के कर्म और जप
| कर्म प्रकार | जप का प्रभाव |
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| संचित (संचित, अभी फल नहीं दिया) | जप से क्षय |
| प्रारब्ध (वर्तमान जीवन में भोगना) | सहन करने की शक्ति मिलती है |
| आगामी (भविष्य के कर्म) | जप के संस्कार से शुभ होते हैं |
विशेष
विष्णु पुराण: 'हरि नाम जप' — एक बार सच्चे मन से — अनेक जन्मों के पाप नष्ट।
शर्त
गीता: 'सच्चे मन से।' पाप करते रहें और जप भी करें — यह नहीं चलेगा। जप के साथ जीवन में परिवर्तन आवश्यक।





