विस्तृत उत्तर
मकर संक्रांति पर दान का विशेष शास्त्रीय विधान है। सूर्य के उत्तरायण होने (मकर राशि प्रवेश) पर दान का पुण्य करोड़ गुना बढ़ जाता है।
शास्त्रीय विधान
1. पुण्यकाल: मकर संक्रांति का पुण्यकाल = सूर्य संक्रांति के 16 घटी (लगभग 6 घण्टे 24 मिनट) पूर्व से 16 घटी बाद तक। इसी काल में दान सर्वाधिक फलदायी।
1स्नान-दान-पूजा क्रम
प्रातःकाल तिल मिश्रित जल से स्नान → सूर्य अर्घ्य → दान → पूजा → भोजन। स्नान के बिना दान नहीं करना चाहिए।
2प्रमुख दान सामग्री
- ▸तिल दान (सर्वोत्तम): काले तिल, तिल लड्डू, तिलकुट।
- ▸गुड़ दान: गुड़, रेवड़ी, गजक।
- ▸खिचड़ी दान: उड़द-चावल की खिचड़ी (इसलिए 'खिचड़ी पर्व' भी कहते हैं)।
- ▸वस्त्र दान: ऊनी/गर्म वस्त्र (शीत ऋतु में अत्यंत पुण्यदायी)।
- ▸अन्नदान: चावल, गेहूँ, दालें।
- ▸गोदान: यथाशक्ति गोदान सर्वश्रेष्ठ।
- ▸घी-तेल दान: तिल तेल, घी।
- ▸धातु दान: ताँबे का बर्तन।
4. संकल्प मंत्र: 'मकरसंक्रान्तिपुण्यकाले दानं करिष्ये।' (मकर संक्रांति पुण्यकाल में दान करता हूँ।)
5. दान पात्र: ब्राह्मण, गरीब, असहाय, विधवा, अनाथ — जो सच्चे जरूरतमंद हों। 'पात्रे दानं महत्फलम्।'
6. तर्पण: मकर संक्रांति पर पितरों का तर्पण (तिल-जल से) भी शास्त्रोक्त है।
7. गंगा स्नान: गंगा (प्रयाग/काशी/हरिद्वार) या अन्य पवित्र नदी में स्नान और दान का विशेष पुण्य।
विशेष: भीष्म पितामह ने उत्तरायण (मकर संक्रांति) की प्रतीक्षा में देह त्याग किया — इसलिए इस दिन को देह त्याग/मुक्ति हेतु भी अत्यंत शुभ माना गया है। मकर संक्रांति पर किया गया दान अक्षय (कभी समाप्त न होने वाला) फल देता है।





