विस्तृत उत्तर
हाँ — भगवान भक्ति का भाव देखते हैं।
गीता (9.30): *'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्, साधुरेव स मन्तव्यः...'*
— यदि अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भक्ति से मुझे भजे, वह साधु ही माना जाए।
गीता (9.26): भगवान पत्ता-फूल-जल भी भक्ति से स्वीकार करते हैं — भोजन नहीं, भाव देखते हैं।
शास्त्रीय दृष्टि: शाकाहार = सात्विक = उत्तम। मांसाहार = तामसिक (गीता 17.10)। पर मांसाहार = पूजा अयोग्य — ऐसा कहीं नहीं। कई क्षत्रिय, ब्राह्मण (बंगाल आदि) मांसाहारी + भक्त।
व्यावहारिक: पूजा के दिन/समय = सात्विक रहें। मांसाहार = पूरी तरह छोड़ना अनिवार्य नहीं — धीरे-धीरे कम करें।
सार: भगवान किसी को नहीं ठुकराते — सच्ची भक्ति सबसे बड़ी शर्त। शाकाहार उत्तम पर अनिवार्य नहीं।





