विस्तृत उत्तर
शास्त्र स्वयं कहते हैं:
मन्त्र मूलं गुरुर्वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरु कृपा।
अर्थात्: मंत्र का मूल गुरु का वाक्य है, और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है।
गुरु ही मंत्र को 'चैतन्य' (जीवित) करके शिष्य को प्रदान करता है।
'मन्त्र मूलं गुरुर्वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरु कृपा' का अर्थ: मंत्र का मूल गुरु का वाक्य है और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा — गुरु ही मंत्र को चैतन्य करते हैं।
शास्त्र स्वयं कहते हैं:
मन्त्र मूलं गुरुर्वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरु कृपा।
अर्थात्: मंत्र का मूल गुरु का वाक्य है, और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है।
गुरु ही मंत्र को 'चैतन्य' (जीवित) करके शिष्य को प्रदान करता है।
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