विस्तृत उत्तर
मनुस्मृति के द्वादश अध्याय में महर्षि मनु ने बताया है कि जब चारों वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—के मनुष्य अपने-अपने निर्धारित स्वधर्म और कर्तव्यों से च्युत हो जाते हैं, तो उन्हें उनके वर्ण और कर्म के अनुसार विशिष्ट प्रकार की प्रेत योनि प्राप्त होती है। ब्राह्मण धर्म से च्युत होने पर उल्कामुख प्रेत बनता है, क्षत्रिय धर्म से च्युत होने पर कटपूतन प्रेत बनता है, वैश्य धर्म से च्युत होने पर मैत्राक्षज्योतिक प्रेत बनता है और शूद्र धर्म से च्युत होने पर चैलाशक प्रेत बनता है। इन प्रेतों का स्वरूप और भोजन भी उनके कर्म के अनुसार भिन्न-भिन्न बताया गया है।
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