विस्तृत उत्तर
आचार्य मेधातिथि ने मनुस्मृति के वसु-रुद्र-आदित्य श्लोक पर अपने मनुभाष्य में अत्यंत मनोवैज्ञानिक और तात्विक व्याख्या की है। उनके अनुसार इस श्लोक का उद्देश्य उस व्यक्ति को प्रेरित करना है जो द्वेष, अज्ञान या मोहभंग के कारण अपने पिता या पूर्वजों का श्राद्ध करने से विमुख हो गया है। जब वह व्यक्ति समझेगा कि उसके तीन पीढ़ियों के पूर्वज मृत्यु के बाद सामान्य आत्माएँ नहीं रह जाते, बल्कि वसु, रुद्र और आदित्य देवताओं के समान पूजनीय और शक्तिशाली हो जाते हैं, तब वह श्रद्धा और भय-मिश्रित भक्ति के साथ पिण्डदान करेगा। मेधातिथि यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह वर्गीकरण वेदों में विहित है, इसलिए यह शाश्वत और अपरिवर्तनीय है।
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