विस्तृत उत्तर
प्राचीन शास्त्रों विशेषकर मीमांसा न्याय प्रकाश और अन्य दर्शन ग्रंथों में स्वर्ग को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया गया है। स्वर्ग की यह शास्त्रीय परिभाषा एक प्रसिद्ध श्लोक में इस प्रकार दी गई है — 'यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम्। अभिलाषोपनीतं च तत्सुखं स्वःपदास्पदम्॥' इस श्लोक का तात्विक अर्थ यह है कि वह सुख जो किसी भी प्रकार के सांसारिक दुःख, क्लेश या पीड़ा से तनिक भी मिश्रित नहीं है, जिसके पश्चात भविष्य में किसी भी प्रकार के कष्ट या पतन का आवरण नहीं है, और जो केवल अभिलाषा (इच्छा) करने मात्र से स्वतः प्राप्त हो जाता है उस परम सात्त्विक और दिव्य सुख के आश्रय स्थल को ही स्वर्लोक या स्वर्ग कहा जाता है। मीमांसा दर्शन स्वर्ग को किसी सामान्य भौतिक स्थान से अधिक एक ऊर्ध्व ऊर्जा-क्षेत्र के रूप में परिभाषित करता है।
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