विस्तृत उत्तर
भगवान को अर्पित नैवेद्य (भोग) = प्रसाद। इसे ग्रहण करने की विशेष विधि है:
- 1श्रद्धापूर्वक ग्रहण: प्रसाद = भगवान का अनुग्रह। अत्यंत श्रद्धा और कृतज्ञता से ग्रहण करें — भोजन नहीं, दैवी कृपा है।
- 1दाहिने हाथ से: दाहिने हाथ से प्रसाद लें। सिर से लगाकर (माथे पर स्पर्श) फिर ग्रहण करें।
- 1तुरंत ग्रहण: प्रसाद को अधिक समय तक रोककर न रखें। शीघ्र ग्रहण करें।
- 1जूठा न करें: प्रसाद को जूठे हाथ से न छुएँ। पहले हाथ शुद्ध करें।
- 1भूमि पर न गिराएँ: प्रसाद भूमि पर गिरना अपमान। सावधानी से ग्रहण करें। गिर जाए तो उठाकर सम्मानपूर्वक पौधे/वृक्ष के नीचे रख दें।
- 1बाँटें: प्रसाद अकेले न खाएँ — परिवार, मित्रों, जरूरतमंदों को बाँटें। 'प्रसाद बाँटने से गुणा होता है।'
- 1निर्माल्य नियम: भगवान पर चढ़े पुष्प, तुलसी (निर्माल्य) = प्रसाद। इसे पैर से न लगाएँ, सम्मानपूर्वक नदी/वृक्ष में विसर्जित करें।
विशेष: चरणामृत (अभिषेक जल) = सर्वोच्च प्रसाद। तीन बार 'ॐ' बोलकर दाहिने हाथ में लेकर पिएँ। शेष सिर पर लगाएँ।





