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मंदिर रहस्य📜 विष्णु पुराण, शिव पुराण, आगम शास्त्र2 मिनट पठन

मंदिर में भगवान को अर्पित करने के बाद बचा नैवेद्य कैसे ग्रहण करें?

संक्षिप्त उत्तर

नैवेद्य ग्रहण: श्रद्धापूर्वक (दैवी कृपा), दाहिने हाथ → माथे से लगाएँ → ग्रहण। शीघ्र खाएँ, जूठे हाथ वर्जित, भूमि न गिराएँ, परिवार-मित्रों में बाँटें। चरणामृत = 'ॐ' 3 बार → दाहिने हाथ → पिएँ। निर्माल्य = सम्मानपूर्वक विसर्जन।

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विस्तृत उत्तर

भगवान को अर्पित नैवेद्य (भोग) = प्रसाद। इसे ग्रहण करने की विशेष विधि है:

  1. 1श्रद्धापूर्वक ग्रहण: प्रसाद = भगवान का अनुग्रह। अत्यंत श्रद्धा और कृतज्ञता से ग्रहण करें — भोजन नहीं, दैवी कृपा है।
  1. 1दाहिने हाथ से: दाहिने हाथ से प्रसाद लें। सिर से लगाकर (माथे पर स्पर्श) फिर ग्रहण करें।
  1. 1तुरंत ग्रहण: प्रसाद को अधिक समय तक रोककर न रखें। शीघ्र ग्रहण करें।
  1. 1जूठा न करें: प्रसाद को जूठे हाथ से न छुएँ। पहले हाथ शुद्ध करें।
  1. 1भूमि पर न गिराएँ: प्रसाद भूमि पर गिरना अपमान। सावधानी से ग्रहण करें। गिर जाए तो उठाकर सम्मानपूर्वक पौधे/वृक्ष के नीचे रख दें।
  1. 1बाँटें: प्रसाद अकेले न खाएँ — परिवार, मित्रों, जरूरतमंदों को बाँटें। 'प्रसाद बाँटने से गुणा होता है।'
  1. 1निर्माल्य नियम: भगवान पर चढ़े पुष्प, तुलसी (निर्माल्य) = प्रसाद। इसे पैर से न लगाएँ, सम्मानपूर्वक नदी/वृक्ष में विसर्जित करें।

विशेष: चरणामृत (अभिषेक जल) = सर्वोच्च प्रसाद। तीन बार 'ॐ' बोलकर दाहिने हाथ में लेकर पिएँ। शेष सिर पर लगाएँ।

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शास्त्रीय स्रोत
विष्णु पुराण, शिव पुराण, आगम शास्त्र
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