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मंदिर रहस्य📜 धर्मसिंधु, मनुस्मृति, कर्मकांड ग्रंथ1 मिनट पठन

मंदिर में प्रसाद अपने दाएं हाथ में क्यों लेना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

दाहिना हाथ: शुभ/पवित्र (परम्परा), देव हस्त (बायाँ=पितृ), सूर्य नाड़ी (सक्रिय/ग्रहणशील), स्वच्छता (बायाँ=शौच कर्म)। विधि: अंजलि मुद्रा (दाहिना ऊपर) या दाहिने हाथ से। सभी शुभ कार्य दाहिने से।

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विस्तृत उत्तर

मंदिर में प्रसाद दाहिने हाथ से लेने का शास्त्रीय विधान है:

  1. 1दाहिना = शुभ: भारतीय परम्परा में दाहिना हाथ = शुभ, पवित्र। सभी शुभ कार्य (दान, ग्रहण, आचमन, तिलक) दाहिने हाथ से।
  1. 1देव हस्त: दाहिना हाथ = 'देव हस्त' कहलाता है। बायाँ = पितृ हस्त। प्रसाद = देवता का अनुग्रह — देव हस्त से ग्रहण करना उचित।
  1. 1ऊर्जा ग्रहण: योग/तंत्र शास्त्र में दाहिना हाथ = सूर्य नाड़ी (पिंगला) से जुड़ा = सक्रिय, ग्रहणशील। बायाँ = चन्द्र नाड़ी (इड़ा)। दैवी ऊर्जा दाहिने हाथ से अधिक प्रभावी ढंग से शरीर में प्रवेश करती है (शास्त्रीय मान्यता)।
  1. 1स्वच्छता: परम्परागत रूप से बायाँ हाथ शौच कर्म के लिए प्रयुक्त — अतः भोजन/प्रसाद दाहिने हाथ से।
  1. 1विधि: प्रसाद लेते समय दोनों हाथ जोड़कर (अंजलि मुद्रा) लें, किन्तु दाहिना हाथ ऊपर रहे। या केवल दाहिने हाथ से लें, बायाँ नीचे सहारे में।
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शास्त्रीय स्रोत
धर्मसिंधु, मनुस्मृति, कर्मकांड ग्रंथ
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