विस्तृत उत्तर
भगवान को पंखा (चँवर/व्यजन) झलना 'उपचार सेवा' का महत्वपूर्ण अंग है:
- 1राजसी उपचार: मंदिर = देवता का राजमहल। जैसे राजा को चँवर/पंखा झला जाता है, वैसे ही भगवान को। यह उनका राजसी सम्मान।
- 1षोडशोपचार का अंग: 16 उपचारों में 'व्यजन' (पंखा) = एक उपचार। इसे 'वायुसेवा' कहते हैं।
- 1भक्ति = सेवा: भगवान को कोई भौतिक आवश्यकता नहीं — उन्हें ताप नहीं लगता। किन्तु भक्त सेवा भाव से पंखा झलता है = 'प्रभु, मैं आपका दास हूँ, आपकी सेवा मेरा सौभाग्य।' यही परम भक्ति।
- 1अहंकार विनाश: सर्वशक्तिमान को पंखा झलना = भक्त अपने अहं का विसर्जन करता है। 'मैं कुछ नहीं, सेवक हूँ' — यह भाव साधना का सार।
- 1चँवर = शुभता: चँवर (याक की पूँछ का पंखा) = शुभता, ऐश्वर्य, दिव्यता का प्रतीक। चँवर सेवा = भगवान के दिव्य वातावरण का निर्माण।
विशेष: दक्षिण भारत मंदिरों में 'तिरुविजय' (पंखा सेवा) अत्यंत सम्मानित सेवा मानी जाती है।





