विस्तृत उत्तर
दोनों — स्तर पर निर्भर:
जप = ध्यान की तैयारी (प्रारंभिक)
पतंजलि योग: धारणा → ध्यान → समाधि। जप = धारणा (एकाग्रता) = ध्यान की पूर्व भूमिका। मन चंचल → जप से एकाग्र → फिर ध्यान सहज।
जप = स्वयं ध्यान (गहन)
जब जप इतना गहन हो कि मंत्र, जपकर्ता और देवता = एक हो जाएं → यह ध्यान ही है। भक्ति दर्शन: नाम जप = सर्वोच्च ध्यान — 'नाम में और नामी में भेद नहीं।'
क्रम: जप (वाचिक) → जप (उपांशु) → जप (मानस) → अजपा जप → ध्यान → समाधि।
सार: शुरुआत = तैयारी। गहन = स्वयं ध्यान। 'जप से ध्यान, ध्यान से समाधि।'





