विस्तृत उत्तर
जप → समाधि मार्ग:
पतंजलि (योग सूत्र 1.28): 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' — मंत्र जप + उसके अर्थ का भावन = ईश्वर साक्षात्कार।
क्रम
- 1जप (धारणा): मंत्र पर ध्यान = एकाग्रता।
- 2ध्यान: निरंतर एकाग्रता = ध्यान — मंत्र + मन = एक धारा।
- 3समाधि: ध्यान इतना गहन कि मंत्र, मन, देवता = तीनों एक = समाधि।
- 4सविकल्प: 'मैं जप कर रहा हूं' = अभी भेद।
- 5निर्विकल्प: 'मैं' भी नहीं — केवल ब्रह्म/देवता = पूर्ण समाधि।
भक्ति मार्ग: चैतन्य/मीरा/रामकृष्ण = नाम जप → भाव समाधि — प्रेम इतना तीव्र कि बाह्य जगत विस्मृत।
अवधि: वर्षों का नियमित अभ्यास। गुरु कृपा = त्वरित।





