विस्तृत उत्तर
कपूर (Camphor) पूजा में अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री है। इसे 'कर्पूर' कहा जाता है और आरती व शुद्धि दोनों में इसका उपयोग होता है।
कपूर जलाने का धार्मिक महत्व
- 1आत्म-समर्पण का प्रतीक — कपूर जलकर पूर्णतः समाप्त हो जाता है, कोई अवशेष नहीं छोड़ता। यह भक्त के पूर्ण समर्पण और अहंकार के विलय का प्रतीक है।
- 2प्रकाश और सुगंध — कपूर की लौ और सुगंध दोनों दैवी वातावरण बनाती हैं।
- 3आरती — कपूर से आरती करना सर्वाधिक प्रचलित और शुभ है।
जलाने के नियम
- 1आरती में — आरती थाली में कपूर जलाकर भगवान के सामने घड़ी की दिशा (clockwise) में घुमाएं।
- 2शुद्धि हेतु — प्रत्येक कमरे में कपूर जलाकर घुमाना वातावरण शुद्ध करता है। सप्ताह में कम से कम एक बार करें।
- 3मात्रा — एक या दो टुकड़े पर्याप्त हैं।
- 4समय — संध्या काल (सूर्यास्त के समय) सर्वोत्तम। प्रातःकाल भी शुभ।
- 5पात्र — तांबे या पीतल के पात्र में जलाएं। प्लास्टिक या कागज पर न जलाएं।
कपूर के अन्य लाभ
- ▸आयुर्वेदिक — कपूर की सुगंध श्वसन तंत्र शुद्ध करती है, सिरदर्द और तनाव कम करती है।
- ▸कीटनाशक — कपूर प्राकृतिक कीट विकर्षक (insect repellent) है।
- ▸वायु शुद्धि — जीवाणुरोधी गुण।
सावधानी
- ▸शुद्ध कपूर (भीमसेनी कपूर / Bhimseni Kapoor) का उपयोग करें — यह प्राकृतिक और खाद्य योग्य होता है।
- ▸सिंथेटिक कपूर (Naphthalene) से बचें — यह विषैला हो सकता है और पूजा में अनुपयुक्त है।
- ▸कपूर की लौ तेज होती है — सावधानी से जलाएं।





