विस्तृत उत्तर
प्रसाद वितरण का क्रम शास्त्रीय परंपरा और सामाजिक शिष्टाचार दोनों पर आधारित है।
प्रसाद वितरण का शास्त्रीय क्रम
- 1पूजा करने वाला (यजमान/पुजारी) — सर्वप्रथम पूजा करने वाला स्वयं भगवान का प्रसाद ग्रहण करता है। यह भगवान की कृपा स्वीकार करने का प्रतीक है।
- 1गुरु/पुरोहित — यदि कोई पंडित/गुरु पूजा करा रहे हैं तो उन्हें प्रसाद दें।
- 1बड़े-बुजुर्ग — परिवार के वरिष्ठ सदस्यों (दादा-दादी, माता-पिता) को।
- 1अतिथि — यदि कोई अतिथि उपस्थित हो तो। 'अतिथि देवो भव' — अतिथि को सम्मान दें।
- 1परिवार के अन्य सदस्य — पत्नी/पति, भाई-बहन, संतान।
- 1बच्चे — छोटे बच्चों को।
- 1सेवक/कर्मचारी — यदि कोई सहायक उपस्थित हो।
- 1पशु-पक्षी — गाय, कुत्ते आदि को भी प्रसाद देना शुभ माना जाता है।
प्रसाद ग्रहण करने के नियम
- 1दाहिने हाथ से — प्रसाद सदैव दाहिने हाथ से लें और दें। बायां हाथ दाहिने के नीचे सहारे में रखें।
- 2खड़े होकर न लें — यदि संभव हो तो बैठकर या झुककर प्रसाद ग्रहण करें।
- 3भूमि पर न गिराएं — प्रसाद गिरने न दें।
- 4मना न करें — प्रसाद कभी मना न करें, यह अशुभ माना जाता है।
- 5जूठा प्रसाद — किसी का जूठा प्रसाद लेना (विशेषकर गुरु या संत का) भक्ति परंपरा में अत्यंत शुभ माना जाता है।
विशेष
- ▸प्रसाद वितरण सबके लिए समान मात्रा में करें — भेदभाव न करें।
- ▸प्रसाद बचे तो पड़ोसियों, जरूरतमंदों या पशु-पक्षियों को दें।





