विस्तृत उत्तर
पूजा में ध्यान का महत्व भगवद् गीता और भागवत पुराण में वर्णित है:
बिना ध्यान की पूजा
भागवत पुराण में कहा गया है — 'अभक्तं पूजनं शवः' — जिसमें भक्ति और ध्यान नहीं, वह पूजा शव (मृत) के समान है। विधि है लेकिन प्राण नहीं।
ध्यान पूजा का प्राण है
- 1संबंध: ध्यान के बिना पूजा — रस्म है, रिश्ता नहीं। ध्यान से पूजा — भगवान से सीधा संवाद।
- 2फल: भगवद् गीता: 'योगिनाम् अपि सर्वेषाम्...' — सब साधनाओं में भक्त जो ध्यानपूर्वक पूजा करता है, वह श्रेष्ठ।
- 3मन का परिष्कार: ध्यानपूर्वक पूजा से मन धीरे-धीरे देव के रंग में रंगता है।
व्यावहारिक उपाय
- 1पूजा से पहले 2 मिनट शांत बैठें
- 2श्वास पर ध्यान दें
- 3मंत्र बोलते समय अर्थ पर ध्यान दें
- 4भगवान की मूर्ति को ध्यान से देखें
पातंजल योग
ध्यान = धारणा के बाद जब मन एकाग्र हो जाए। पूजा ध्यान का सबसे सरल और सुलभ द्वार है।





