विस्तृत उत्तर
पूजा में मंत्र का महत्व ऋग्वेद और मंडूक्य उपनिषद में वर्णित है:
1मंत्र = देवता का नाम/स्वरूप
मंत्रो हि देवताया स्वरूपम्' — मंत्र देवता का ही स्वरूप है। जब मंत्र बोला जाता है, देवता आह्वान होते हैं।
2ध्वनि की शक्ति
वैज्ञानिक दृष्टि से — प्रत्येक ध्वनि में विशेष कंपन (frequency) होती है। संस्कृत मंत्रों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क के विशेष भागों को सक्रिय करती हैं।
3मन को एकाग्र करना
मंत्र पाठ से मन भटकाव छोड़कर एक बिंदु पर केंद्रित होता है। गीता 17.14-16 में 'मंत्र जप' को तप का एक अंग कहा गया है।
4वातावरण शुद्धि
मंत्र की ध्वनि तरंगें वातावरण को शुद्ध करती हैं। वैदिक यज्ञ में मंत्र के साथ अग्नि — दोहरी शुद्धि।
5संकल्प शक्ति
मंत्र को बोलना एक संकल्प है — 'मैं इस देवता की शरण में हूँ।' यह विश्वास और समर्पण की अभिव्यक्ति है।
मंडूक्य उपनिषद
ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्' — 'ॐ' यह एक अक्षर ही सब कुछ है।





