विस्तृत उत्तर
प्रार्थना के विज्ञान को समझने के लिए तीन स्तरों पर देखना होगा — शास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक और चेतना-विज्ञान।
शास्त्रीय विज्ञान — वेद-उपनिषद में प्रार्थना को 'ब्रह्म-संवाद' कहते हैं। जब जीव अपने अहंकार को छोड़कर परमात्मा के प्रति ग्रहणशील होता है, तो चेतना की उच्चतर शक्तियाँ सक्रिय होती हैं। श्रीमद्भागवत में संकीर्तन को 'चेतो-दर्पण-मार्जनम्' — चित्त-दर्पण की सफाई — कहा गया है।
मनोवैज्ञानिक विज्ञान — नियमित प्रार्थना से मस्तिष्क में 'अल्फा तरंगें' उत्पन्न होती हैं जो शांति और एकाग्रता लाती हैं। यह तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) को कम करती है। प्रार्थना से मन में 'आशा' और 'विश्वास' की भावना बलवती होती है जो व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी कार्यशील रखती है।
चेतना-विज्ञान — जब कोई व्यक्ति गहरी एकाग्रता से प्रार्थना करता है, तो उसकी चेतना-तरंगें उच्च आवृत्ति पर कम्पित होती हैं। प्राचीन भारतीय विज्ञान में यही 'मंत्र-विज्ञान' का आधार है — ध्वनि के कम्पन से ब्रह्मांडीय चेतना से संपर्क होता है।
संकीर्तन और सामूहिक प्रार्थना में — 'संघे शक्ति: कलौ युगे' — साथ में की गई प्रार्थना व्यक्तिगत से अधिक प्रभावशाली होती है क्योंकि अनेक चेतनाओं की तरंगें एक साथ उठती हैं और उनकी संयुक्त शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
सार यह है — प्रार्थना न केवल आस्था का विषय है, यह चेतना को परिष्कृत करने का एक वैज्ञानिक उपाय भी है।





