विस्तृत उत्तर
प्रेत योनि से मुक्ति के लिए शास्त्रों में संतति द्वारा निष्ठापूर्वक किया गया गया-श्राद्ध, पिण्डदान और श्रीमद्भागवत महापुराण जैसे पवित्र ग्रन्थों का श्रवण बताया गया है। गरुड़ पुराण में पिण्डदान और श्राद्ध का महत्व बताया गया है, क्योंकि इनके अभाव में जीव प्रेत बनकर भटक सकता है। धुन्धुकारी का आख्यान इस बात का प्रमाण है कि घोर प्रेत योनि में भी मुक्ति संभव है। गोकर्ण ने पहले गया श्राद्ध किया, पर धुन्धुकारी के पाप अत्यंत भयंकर थे। अंततः सूर्यदेव के निर्देश पर सात दिनों तक श्रीमद्भागवत पुराण का पारायण हुआ और भागवत कथा के प्रभाव से धुन्धुकारी प्रेत योनि से मुक्त होकर वैकुंठ धाम चला गया।
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