विस्तृत उत्तर
कुरुवंश के राजा जनमेजय ने अपने पिता (राजा परीक्षित) की तक्षक नाग द्वारा की गई हत्या का बदला लेने के लिए भयंकर 'नागदाह यज्ञ' (सर्पसत्र) आयोजित किया था, जिसमें दुनिया के सारे सांप भस्म होने लगे थे। नाग-जाति को समूल नष्ट होते देख, देवी मनसा की आज्ञा से उनके पुत्र 'मुनिवर आस्तीक' वहाँ गए। उन्होंने अपनी मधुर वाणी और ज्ञान से राजा जनमेजय को प्रसन्न कर लिया और वरदान के रूप में उस यज्ञ को रुकवाकर नाग जाति (और देवराज इंद्र) की रक्षा की।





