विस्तृत उत्तर
सहस्रार (मस्तक शीर्ष, ब्रह्मरन्ध्र) = सर्वोच्च चक्र, 1000 पंखुड़ी कमल। कुंडलिनी सहस्रार तक = शिव-शक्ति ऐक्य।
अमृत अनुभूति
1. 'अमृत' (शास्त्रीय): हठयोग प्रदीपिका: सहस्रार में सूक्ष्म अमृत स्रोत। सामान्यतः जठराग्नि में नष्ट। कुंडलिनी जागरण = अमृत संरक्षित = दिव्यानन्द।
2. अनुभूति: तालु (मुख ऊपरी भाग) में शीतल, मधुर रस — जैसे मीठा शीतल द्रव्य टपक रहा। 'अमृत धारा'/'सोमरस'। भौतिक नहीं — सूक्ष्म ऊर्जात्मक। अत्यन्त आनन्ददायक।
3. परमानन्द: शब्दातीत। सत्-चित्-आनन्द प्रत्यक्ष। बाह्य कारण रहित — स्वयं से उत्पन्न, अनन्त, अक्षय।
4. शिव-शक्ति ऐक्य: कुंडलिनी(शक्ति) + शिव = एक। द्वैत समाप्त — 'अहं ब्रह्मास्मि' साक्षात्कार।
5. श्वेत/स्वर्णिम प्रकाश: 'सहस्र सूर्यों का प्रकाश' (गीता)।
6. समाधि: शरीर-मन-बुद्धि से परे — शुद्ध चेतना। काल-स्थान बोध समाप्त। 'मैं' विलय।
7. शारीरिक: मस्तक शीर्ष (चोटी) पर चींटियाँ, फव्वारा जैसा, शरीर अत्यन्त हल्का, श्वास सूक्ष्म/लगभग रुकना (समाधि में)।
सावधानी: अत्यन्त दुर्लभ — अधिकांश दावे अतिशयोक्ति। पूर्ण जागरण=जीवनमुक्ति। बिना गुरु असम्भव+खतरनाक। शब्दों में वर्णन असम्भव।




