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श्राद्ध विधि📜 धर्मशास्त्र, गरुड़ पुराण1 मिनट पठन

श्राद्ध कर्म करते समय किस दिशा में बैठें?

संक्षिप्त उत्तर

दक्षिण दिशा (यम/पितर दिशा) में मुख। जनेऊ उल्टा (अपसव्य)। कुश आसन, बायाँ घुटना मोड़ें। पिंड/जल दक्षिण में। देव पूजा = उत्तर/पूर्व, पितर = दक्षिण।

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विस्तृत उत्तर

दक्षिण दिशा में मुख करके बैठें — यह श्राद्ध/तर्पण का अनिवार्य नियम है।

क्यों दक्षिण

  • दक्षिण = यम दिशा/पितर दिशा — यमराज और पितृलोक दक्षिण में माने गए हैं।
  • तर्पण/पिंडदान में जल/पिंड दक्षिण दिशा में अर्पित करते हैं।
  • जनेऊ उल्टा (अपसव्य) = बाएं कंधे पर — पितर कर्म विशेष।

अन्य नियम

  • कुश (दर्भ) आसन पर बैठें।
  • बायाँ घुटना मोड़कर बैठें (पितृतीर्थ मुद्रा)।
  • दक्षिण दिशा में पिंड रखें।
  • तर्पण का जल अंगूठा+तर्जनी (पितृतीर्थ) से गिराएँ।

देव पूजा: उत्तर/पूर्व दिशा (देव दिशा)। पितर कर्म: दक्षिण दिशा। यह भेद अनिवार्य।

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शास्त्रीय स्रोत
धर्मशास्त्र, गरुड़ पुराण
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