विस्तृत उत्तर
दक्षिण दिशा में मुख करके बैठें — यह श्राद्ध/तर्पण का अनिवार्य नियम है।
क्यों दक्षिण
- ▸दक्षिण = यम दिशा/पितर दिशा — यमराज और पितृलोक दक्षिण में माने गए हैं।
- ▸तर्पण/पिंडदान में जल/पिंड दक्षिण दिशा में अर्पित करते हैं।
- ▸जनेऊ उल्टा (अपसव्य) = बाएं कंधे पर — पितर कर्म विशेष।
अन्य नियम
- ▸कुश (दर्भ) आसन पर बैठें।
- ▸बायाँ घुटना मोड़कर बैठें (पितृतीर्थ मुद्रा)।
- ▸दक्षिण दिशा में पिंड रखें।
- ▸तर्पण का जल अंगूठा+तर्जनी (पितृतीर्थ) से गिराएँ।
देव पूजा: उत्तर/पूर्व दिशा (देव दिशा)। पितर कर्म: दक्षिण दिशा। यह भेद अनिवार्य।





