विस्तृत उत्तर
नवधा भक्ति के नौ अंगों का विस्तृत अर्थ इस प्रकार है — श्रीमद्भागवत 7.5.23 के आधार पर —
1. श्रवण — भगवान की कथा, लीला, महिमा और गुणों का श्रद्धापूर्वक सुनना। परीक्षित राजा इसके आदर्श हैं जिन्होंने मृत्यु से पहले सात दिन भागवत-कथा सुनी।
2. कीर्तन — भगवान के नाम, गुण और लीलाओं का भावपूर्वक गान करना। शुकदेव जी इसके आदर्श हैं।
3. स्मरण — प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में भगवान का स्मरण। विपत्ति में, विश्राम में, सर्वत्र। भक्त प्रह्लाद इसके आदर्श हैं जो दुःखों में भी विष्णु का स्मरण नहीं भूले।
4. पादसेवन — भगवान के चरणों की सेवा। माता लक्ष्मी इसकी आदर्श भक्त हैं जो भगवान विष्णु के चरण सेवती रहती हैं।
5. अर्चन — मूर्ति या चित्र के माध्यम से षोडशोपचार या पंचोपचार से पूजा-अर्चना। पृथु राजा इसके आदर्श हैं।
6. वंदन — भगवान को, गुरु को, संत-जनों को और समस्त चराचर में परमात्मा को देखकर नमस्कार करना। अक्रूर इसके आदर्श हैं।
7. दास्य — भगवान को स्वामी और स्वयं को उनका दास मानकर सेवा करना। हनुमान जी इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
8. सख्य — भगवान को परम मित्र मानना, अपना सुख-दुःख उनसे बाँटना। अर्जुन, सुदामा और उद्धव इसके आदर्श हैं।
9. आत्मनिवेदन — अहंकार रहित होकर अपना सर्वस्व — मन, बुद्धि, आत्मा — सब भगवान को समर्पित करना। महाराज बलि और गोपियाँ इसके आदर्श हैं।
प्रह्लाद ने कहा था कि इन नौ में से किसी एक को भी पूर्ण भाव से अपना लिया जाए तो मोक्ष निश्चित है।





