विस्तृत उत्तर
तांत्रिक और वैदिक — दोनों हिन्दू उपासना की प्रमाणित पद्धतियाँ हैं, किन्तु इनमें मूलभूत अंतर हैं:
1मूल दृष्टिकोण
- ▸वैदिक: ब्रह्म (निराकार/साकार) की उपासना। बाह्य यज्ञ-हवन प्रधान। देवताओं की स्तुति और आह्वान।
- ▸तांत्रिक: शक्ति/कुण्डलिनी की उपासना। आंतरिक साधना प्रधान। शरीर ही मंदिर — 'देहो देवालयः प्रोक्तः।'
2पूजा पद्धति
- ▸वैदिक: यज्ञ, हवन, सोमयाग, अग्निहोत्र। बाह्य अग्नि में आहुति। सामूहिक पूजा।
- ▸तांत्रिक: न्यास, मुद्रा, मण्डल, यंत्र पूजा। आंतरिक अग्नि (कुण्डलिनी)। गुरु-शिष्य परम्परा में गुप्त साधना।
3मंत्र भेद
- ▸वैदिक: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के मंत्र। छन्द, स्वर, उदात्त-अनुदात्त का कठोर पालन।
- ▸तांत्रिक: बीज मंत्र (ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐं)। शाबर मंत्र। मंत्र की शक्ति शब्दोच्चार से अधिक भावना और संकल्प पर निर्भर।
4अधिकार भेद
- ▸वैदिक: परम्परागत रूप से द्विजों (उपनीत) के लिए। वर्ण-आश्रम व्यवस्था।
- ▸तांत्रिक: जाति-वर्ण का भेद नहीं। 'गुरु कृपा' से कोई भी अधिकारी। महानिर्वाण तंत्र में स्त्री-पुरुष समान अधिकार।
5पंचमकार
- ▸वैदिक: पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) का कोई स्थान नहीं।
- ▸तांत्रिक: वामाचार में पंचमकार का विधान है। दक्षिणाचार में इनका सात्त्विक प्रतीकात्मक अर्थ लिया जाता है।
6देवता स्वरूप
- ▸वैदिक: इन्द्र, अग्नि, वरुण, सोम आदि वैदिक देवता।
- ▸तांत्रिक: शक्ति (काली, तारा, त्रिपुरसुन्दरी), भैरव, दश महाविद्या।
7लक्ष्य
- ▸वैदिक: धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चतुर्वर्ग। यज्ञ-दान-तप।
- ▸तांत्रिक: भोग और मोक्ष दोनों। 'भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी' — इहलोक में शक्ति और परलोक में मुक्ति।
महत्वपूर्ण: दोनों पद्धतियाँ परस्पर विरोधी नहीं हैं। अनेक विद्वानों ने दोनों का समन्वय किया है। आज प्रचलित पूजा पद्धति में वैदिक और तांत्रिक दोनों तत्वों का मिश्रण है।





