विस्तृत उत्तर
तर्पण में श्राद्धकर्ता हाथ में कुशा, काला तिल और जल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपसव्य होकर बैठता है और मन्त्रों द्वारा पितरों को उनके देव स्वरूप में स्थापित करता है। पिता का तर्पण वसु रूप में, पितामह का तर्पण रुद्र रूप में और प्रपितामह का तर्पण आदित्य रूप में किया जाता है। उदाहरण के लिए पिता के लिए कहा जाता है—'अद्येह अमुक गोत्रः अस्मत् पिता अमुक शर्मा वसुरूपः तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः।' इसी प्रकार पितामह के लिए रुद्ररूपः और प्रपितामह के लिए आदित्यरूपः कहा जाता है। यह प्रक्रिया पितरों को मानव सीमाओं से ऊपर उठाकर ब्रह्माण्डीय शक्तियों के रूप में तर्पित करती है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक




