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तंत्र और मंत्र📜 तंत्रालोक (अभिनवगुप्त), कुलार्णव तंत्र, शक्ति संगम तंत्र1 मिनट पठन

तंत्र साधना में मंत्र की क्या भूमिका है?

संक्षिप्त उत्तर

तंत्र में मंत्र: 'मंत्रो हि देवता स्वयम्।' पाँच भूमिकाएं: आवाहन, चक्र जागरण, बाधा निवारण (कवच), मंत्र सिद्धि (पुरश्चरण), ब्रह्म से एकता। 'मंत्रः सर्वस्य साधकः।'

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विस्तृत उत्तर

तंत्र में मंत्र की भूमिका का वर्णन तंत्रालोक और कुलार्णव तंत्र में विस्तार से है:

तंत्रालोक

मंत्रो हि देवता स्वयम्।' — मंत्र स्वयं देवता है। तंत्र में मंत्र = देवता का शरीर।

तंत्र में मंत्र की पाँच भूमिकाएं

1आवाहन

मंत्र से देवता/शक्ति का आवाहन। मंत्र = देवता को बुलाने की भाषा।

2ऊर्जा और चक्र जागरण

मंत्र की ध्वनि विशेष नाड़ियों और चक्रों को जागृत करती है।

3बाधा-निवारण (कवच)

मंत्र की विशेष frequency से नकारात्मक ऊर्जाओं का निवारण।

4सिद्धि का साधन

कुलार्णव: मंत्र जप (पुरश्चरण) = मंत्र सिद्धि। सिद्ध मंत्र = इच्छित फल देने में समर्थ।

5ब्रह्म से एकता

tंत्रालोक: जब 'मंत्र-वीर्य' परिपक्व होती है — साधक मंत्र-देवता-ब्रह्म में एकता अनुभव करता है।

तंत्र के विशेष मंत्र

  • बीज मंत्र — शक्ति का सर्वोच्च संघनन
  • कवच मंत्र — रक्षा
  • श्री विद्या — उच्चतम तंत्र मंत्र

शक्ति संगम तंत्र

मंत्रः सर्वस्य साधकः।
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शास्त्रीय स्रोत
तंत्रालोक (अभिनवगुप्त), कुलार्णव तंत्र, शक्ति संगम तंत्र
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