विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के तेईसवें अध्याय में शिशुमार चक्र के प्रत्येक अंग में देवताओं और नक्षत्रों का स्थान निर्धारित है। पूंछ के अंतिम छोर पर ध्रुव, पूंछ में प्रजापति, अग्नि, इन्द्र और धर्मराज तथा पूंछ के आधार पर धाता और विधाता हैं। कूल्हे (Hip) पर सप्तर्षि मंडल स्थित है। उत्तरी भाग में अभिजित से लेकर पुनर्वसु तक चौदह नक्षत्र और दक्षिणी भाग में पुष्य से लेकर उत्तराषाढ़ा तक चौदह नक्षत्र स्थित हैं। इसकी पीठ पर अजवीथी (मूल, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा) नक्षत्र हैं और पेट साक्षात आकाशगंगा है। कटि पर पुनर्वसु और पुष्य, पंखों पर आर्द्रा और अश्लेषा, नथुनों पर अभिजित और उत्तराषाढ़ा, आंखों पर श्रवण और पूर्वाषाढ़ा तथा कानों पर धनिष्ठा और मूल नक्षत्र स्थित हैं। ऊपरी जबड़े पर महर्षि अगस्त्य, निचले जबड़े पर यमराज, मुख पर मंगल, जननांग पर शनि, गर्दन के पीछे बृहस्पति, गर्दन में राहु, हृदय में भगवान नारायण, मन में चंद्र, नाभि में शुक्र और श्वास में बुध स्थित हैं।
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