विस्तृत उत्तर
तंत्र में साधक की भूमिका कुलार्णव तंत्र और तंत्रालोक में विस्तार से वर्णित है:
कुलार्णव तंत्र — तीन प्रकार के साधक
1पशु भाव (प्रारंभिक)
सामान्य गृहस्थ, भोग और बंधन में। दक्षिण मार्ग उचित।
2वीर भाव (मध्यम)
निर्भय, ऊर्जावान साधक। वाम मार्ग या मिश्र मार्ग।
3दिव्य भाव (उन्नत)
सर्वत्र शिव का दर्शन। परम साधक।
साधक की छह भूमिकाएं
4श्रद्धालु
गुरु और शास्त्र पर अटल श्रद्धा।
5नियमित
नित्य साधना — बिना नागा। नित्यता = सर्वोच्च।
6गोपनीय
साधना, मंत्र, अनुभव — किसी को न बताएं।
7निर्भय
तंत्र में भय का कोई स्थान नहीं।
8शुद्ध उद्देश्य
मोक्ष या देव भक्ति — हानि या स्वार्थ नहीं।
9समर्पित
फल गुरु और देव को। अहंकार नहीं।
तंत्रालोक
साधकः शिवः।' — साधक स्वयं शिव है — केवल पहचानना बाकी है।





