विस्तृत उत्तर
वसु से आदित्य तक पितृ की आध्यात्मिक यात्रा स्थूल से सूक्ष्म और फिर प्रकाशमय अवस्था की ओर बढ़ने वाली यात्रा है। सपिण्डीकरण के बाद नया पितृ वसु बनता है, जो सबसे सघन, पार्थिव और भौतिक संबंध का स्तर है। आगे पदोन्नति में वसु रुद्र बनता है, जो मध्यवर्ती प्राणिक और सूक्ष्म शुद्धि की अवस्था है। रुद्र फिर आदित्य बनता है, जो उच्चतम प्रकाशमय, कारण-शरीर और परमसत्य से जुड़ी मोक्षोन्मुखी अवस्था है। आदित्य से आगे पितर मुख्य पिण्डभाज् श्राद्ध से बाहर होकर उच्चतर लोक, मोक्ष या कर्मानुसार नवीन योनि की ओर गमन करता है।
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