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विस्तृत उत्तर
वायुजा देह वायव्य स्वरूप होती है और मृत्यु के तत्काल बाद आत्मा इसी देह को धारण करती है। यह देह कर्म करने में सर्वथा अक्षम होती है और आत्मा बिना किसी आधार के वायुमंडल में विचरण करती है। उसके पास भौतिक स्थूल देह नहीं होती, इसलिए वह स्थूल अन्न ग्रहण नहीं कर सकती। फिर भी उसकी क्षुधा और पिपासा असीम होती है। इसी कारण प्रथम दस दिनों में पिण्डदान से पिण्डज शरीर का निर्माण आवश्यक माना गया है, और ग्यारहवें तथा बारहवें दिन उसे अन्न, जल और दीपदान दिया जाता है।
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