विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध के पंचम अध्याय के उनतालीसवें श्लोक (२.५.३९) में विराट पुरुष के संदर्भ में सत्यलोक की स्थिति का वर्णन है। महर्षि शुकदेव कहते हैं — ग्रीवायां जनलोकोऽस्य तपोलोकः स्तनद्वयात्। मूर्धभिः सत्यलोकः तु ब्रह्मलोकः सनातनः। अर्थात भगवान के विराट स्वरूप की छाती से लेकर गर्दन तक जनलोक और तपोलोक स्थित हैं जबकि सबसे ऊपरी लोक सत्यलोक विराट पुरुष के मस्तक पर स्थित है। मस्तक पर इसकी स्थिति यह प्रमाणित करती है कि सत्यलोक ज्ञान, सत्य और परम चेतना का सर्वोच्च भौतिक और दार्शनिक केन्द्र है। सम्पूर्ण 14 लोक इसी विराट पुरुष के अवयवों के रूप में वर्णित हैं जहाँ पाताल उनके चरणों के तलवों में और सत्यलोक उनके मस्तक के रूप में सुशोभित है।
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