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विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में लोकों की दूरियों का मापन 'योजन' नामक वैदिक इकाई में किया गया है। एक योजन का परिमाण अत्यंत विशाल माना गया है। दस्तावेज़ के अनुसार इसे प्रायः चार कोस या लगभग 13 से 16 किलोमीटर के तुल्य माना गया है। इसी इकाई के आधार पर ऊर्ध्व लोकों की दूरियों की गणना की गई है, जैसे जनलोक से आठ करोड़ योजन ऊपर तपोलोक और तपोलोक से बारह करोड़ योजन ऊपर सत्यलोक।
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