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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 17

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः | यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन करते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन करते हैं।

English Meaning

Self-conceited, stubborn, filled with the pride and intoxication of wealth, they perform sacrifices in name out of ostentation, contrary to scriptural ordinances.

Self-conceited, stubborn, filled with the pride and intoxication of wealth, they perform sacrifices in name out of ostentation, contrary to scriptural ordinances.

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