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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 18

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं।

English Meaning

Given over to egoism, power, haughtiness, lust and anger, these malicious people hate Me in their own bodies and in those of others.

Given over to egoism, power, haughtiness, lust and anger, these malicious people hate Me in their own bodies and in those of others.

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