सूर्य नवग्रह मंत्र
ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।
जन्म कुंडली में सूर्य के नीच राशि (तुला), शत्रु क्षेत्रीय अथवा राहु-केतु के साथ ग्रहण दोष में स्थित होने पर उत्पन्न होने वाली भयंकर राजकीय बाधाओं, कार्यस्थल पर अपयश, और पितृ दोष के निवारण हेतु यह वैदि
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
जन्म कुंडली में सूर्य के नीच राशि (तुला), शत्रु क्षेत्रीय अथवा राहु-केतु के साथ ग्रहण दोष में स्थित होने पर उत्पन्न होने वाली भयंकर राजकीय बाधाओं, कार्यस्थल पर अपयश, और पितृ दोष के निवारण हेतु यह वैदिक प्रयोग अत्यंत अचूक है। इसके अतिरिक्त हृदय रोग, नेत्र विकार, और अस्थि मज्जा से संबंधित व्याधियों के शमन के लिए इसका प्रयोग होता है। इस मंत्र की साधना से व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता, जीवन शक्ति (Vitality), और प्रशासनिक क्षेत्र में मान-सम्मान की त्वरित वृद्धि होती है। 1
इस मंत्र से क्या होगा?
जन्म कुंडली में सूर्य के नीच राशि (तुला), शत्रु क्षेत्रीय अथवा राहु-केतु के साथ ग्रहण दोष में स्थित होने पर उत्पन्न होने वाली भयंकर राजकीय बाधाओं, कार्यस्थल पर अपयश, और पितृ दोष के निवारण हेतु यह वैदिक प्रयोग अत्यंत अचूक है
इसके अतिरिक्त हृदय रोग, नेत्र विकार, और अस्थि मज्जा से संबंधित व्याधियों के शमन के लिए इसका प्रयोग होता है
इस मंत्र की साधना से व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता, जीवन शक्ति (Vitality), और प्रशासनिक क्षेत्र में मान-सम्मान की त्वरित वृद्धि होती है
जाप विधि
इस ऋग्वेदिक और यजुर्वेदीय मंत्र का अनुष्ठान रविवार के दिन सूर्य की होरा अथवा कृतिका, उत्तराफाल्गुनी या उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठकर आरंभ किया जाना चाहिए। लाल चंदन अथवा रुद्राक्ष की एक सौ आठ मनकों वाली शुद्ध माला का उपयोग करते हुए चालीस दिनों के भीतर सात हजार मंत्रों का जप पूर्ण करना अनिवार्य है। जप काल के दौरान सात्विक आहार और लाल वस्त्रों का धारण शास्त्रसम्मत है। अनुष्ठान की समाप्ति पर मदार (आक) की समिधा से दशांश हवन संपन्न करना चाहिए। 1
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