भद्रकाली उग्र मंत्र
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा
महाघोर संकट व शत्रु का नाश, और जीवन में अघोर भयमुक्ति 41।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
महाघोर संकट व शत्रु का नाश, और जीवन में अघोर भयमुक्ति 41।
इस मंत्र से क्या होगा?
महाघोर संकट व शत्रु का नाश, और जीवन में अघोर भयमुक्ति
जाप विधि
उग्र ध्यान व 10 बार प्राणायाम के पश्चात् मंत्र जप। जप की समाप्ति के बाद साधारण अवस्था में वापस आने के लिए कुछ देर पुनः शांत ध्यान अवश्य करें 41।
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ह्रौं
sabar mantraभैरव शिव का चेला जहां जहां-जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड काचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा ओम गुरु जी गोरख जति मच्छिंद्र का चेला शिव के रूप में दिखे अलबेला कानों कुंडल गले में नादी हाथ त्रिशूल नाथ है आदि अलख पुरुष को करूं आदेश जन्म जन्म के काटो कलेश भगवा वेश हाथ में खप्पर भैरव शिव का चेला जहां जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड कांचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा 2
naam mantraसौम्य
kavach mantraनासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20
vaidik mantraॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
gyan mantraतत्त्वमसि