दिव्यास्त्रद्रोणाचार्य ने नारायणास्त्र किसे दिया?द्रोणाचार्य ने नारायणास्त्र मुख्य रूप से अपने पुत्र अश्वत्थामा को दिया। कुछ मतों के अनुसार अर्जुन को भी इसका ज्ञान दिया था।#द्रोणाचार्य#नारायणास्त्र#अश्वत्थामा
तंत्र शास्त्रतंत्र में गुरु सेवा का क्या महत्व है?गुरु गीता: 'गुरुसेवा = सबसे बड़ा तप।' कृपा प्राप्ति (सेवा→कृपा→सिद्धि), अहंकार नाश, ज्ञान (सान्निध्य), कर्म शुद्धि, शक्ति संचार। सेवा: शारीरिक (आश्रम), वाचिक (प्रचार), मानसिक (आज्ञा), आर्थिक (दान)। एकलव्य, हनुमान = आदर्श।#गुरु सेवा#सेवा
तंत्र शास्त्रतंत्र में गुरु परंपरा का क्या महत्व है?गुरु परंपरा = तंत्र रीढ़। शक्ति: गुरु→शिष्य अखंड श्रृंखला। शुद्ध ज्ञान (मुखतः), सुरक्षा, पात्रता परीक्षण। कुलार्णव: शिव→शक्ति→गुरु→शिष्य। आगम-कल्पद्रुम: माता दीक्षा = 8 गुना फलदायी।#गुरु परंपरा#शिष्य#परम्परा
मंत्र विधिमंत्र जप में गुरु का मार्गदर्शन कैसे लें?गुरु = सबसे महत्वपूर्ण। पहचान: शास्त्र+अनुभव, निःस्वार्थ, परंपरा, शुद्ध आचरण। कैसे: दीक्षा, नियमित संपर्क, प्रश्न, आज्ञा पालन, सेवा। न मिले: सद्ग्रंथ=गुरु, नाम जप, ईश्वर से प्रार्थना।#गुरु#मार्गदर्शन#शिष्य
महायोगमहायोग का उपदेश किसे दिया गया?अघोर परमेश्वर की उपासना करने के बाद चार कुमारों ने अपने शिष्यों को महायोग का उपदेश दिया।#महायोग#उपदेश#शिष्य
योग अभ्यासयोग शुरू करने से पहले किसे प्रणाम करना चाहिए?योग शुरू करने से पहले गुरु, शिव, पार्वती, गणेश और शिष्यों सहित योगीश्वरों को प्रणाम करना चाहिए।#योग आरम्भ#गुरु प्रणाम#शिव
पाशुपत योगपाशुपत योग से परम ऐश्वर्य कैसे मिलता है?पाशुपत योग सबको परम ऐश्वर्य दिलाने हेतु पशुपति रुद्र द्वारा प्रवर्तित बताया गया है।#पाशुपत योग#परम ऐश्वर्य#पशुपति रुद्र
पाशुपत योगपाशुपत योग प्राप्त करने से क्या फल मिला?पाशुपत योग प्राप्त करने से शिष्य और प्रशिष्य शिवलोक के अधिकारी हुए।#पाशुपत योग#शिवलोक#शिष्य
पाशुपत योगयोगाचार्यों के शिष्य और प्रशिष्य कहाँ पहुँचे?योगाचार्यों के सैकड़ों-हजारों शिष्य और प्रशिष्य पाशुपत योग प्राप्त कर शिवलोक के अधिकारी हुए।#शिष्य#प्रशिष्य#पाशुपत योग
शिष्य परम्पराशैवी दीक्षा क्या बताई गई है?शैवी दीक्षा का अलग विधि-वर्णन यहाँ नहीं है; योगाचार्यों के शिष्य शैवी दीक्षा से सम्पन्न बताए गए हैं।#शैवी दीक्षा#शिष्य#भस्म
शिष्य परम्परापराशर, गर्ग, भार्गव और अंगिरा कौन थे?पराशर, गर्ग, भार्गव और अंगिरा योगाचार्यों के शिष्यों की विस्तृत नामावली में बताए गए हैं।#पराशर#गर्ग#भार्गव
शिष्य परम्पराकपिल, आसुरि, पंचशिख और वाल्कल कौन थे?कपिल, आसुरि, पंचशिख और महायोगी वाल्कल योगाचार्यों के शिष्यों की सूची में बताए गए हैं।#कपिल#आसुरि#पंचशिख
शिष्य परम्परासनक, सनन्द, सनातन और सनत्कुमार किस समूह में बताए गए हैं?सनक, सनन्द, दिव्यशक्तिसम्पन्न सनातन और सनत्कुमार योगाचार्यों के शिष्यों की सूची में बताए गए हैं।#सनक#सनन्द#सनातन
शिष्य परम्पराश्वेत, श्वेतशिखण्डी, श्वेताश्व और श्वेतलोहित कौन थे?ये योगाचार्यों के शिष्यों की नामावली के प्रारम्भ में बताए गए धर्मात्मा और महान् ओजस्वी शिष्य थे।#श्वेत#श्वेतशिखण्डी#श्वेताश्व
शिष्य परम्परायोगेश्वरों के चार-चार शिष्य कैसे थे?योगेश्वरों के चार-चार शिष्य थे, जो काम और क्रोध आदि विकारों से रहित बताए गए हैं।#योगेश्वर#चार शिष्य#काम क्रोध रहित
शिष्य परम्पराशिव की कृपा से योग में कौन प्रवृत्त हुए?व्यासावतार, योगाचार्यावतार, शिवावतार, चार शिष्य और अनेक प्रशिष्य महेश्वर की कृपा से योग में प्रवृत्त हुए।#शिव कृपा#योग#व्यासावतार
शास्त्र ज्ञानउपनिषद में गुरु का महत्व क्या है?उपनिषदों में गुरु अनिवार्य है। मुण्डकोपनिषद (1/2/12) में श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाने का आदेश है। छान्दोग्य (6/14/2) में गुरु 'अंधे को मार्ग दिखाने वाला' है। श्वेताश्वतर (6/23) — ईश्वर और गुरु में समान भक्ति से ही उपनिषद-ज्ञान प्रकट होता है।#गुरु#उपनिषद#आचार्य
गुरु-शिष्य परंपराशिष्य क्या होता है?शिष्य वह है जो गुरु के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक उन्नति के लिए समर्पित साधना करता है। आदर्श शिष्य में श्रद्धा, समर्पण, जिज्ञासा, विनम्रता और सेवाभाव होना चाहिए। शास्त्रों में मुमुक्षा, विवेक और वैराग्य को शिष्य की पात्रता के लिए आवश्यक माना गया है।#शिष्य#गुरु-शिष्य#साधक