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Katha

शुक्रवार व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं प्रामाणिक पौराणिक पाठ

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शुक्रवार व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथाएँ

यह शोध-प्रपत्र शुक्रवार व्रत के अवसर पर पारंपरिक रूप से पढ़ी और सुनी जाने वाली प्रामाणिक कथाओं का एक अक्षुण्ण, विस्तृत और क्रमबद्ध संकलन प्रस्तुत करता है। भारतीय लोक-परंपरा और प्राचीन व्रत-पुस्तिकाओं के आधार पर, शुक्रवार का दिन मुख्य रूप से देवी उपासना (माता संतोषी, वैभव लक्ष्मी, महालक्ष्मी) और नवग्रहों में शुक्र देव की आराधना के लिए समर्पित है । व्रत का पूर्ण फल और मनोवांछित सिद्धि तभी प्राप्त होती है, जब साधक इन कथाओं का श्रवण या पठन पारंपरिक विधान, पूर्ण श्रद्धा और बिना किसी आधुनिक काँट-छाँट के करता है ।

विभिन्न क्षेत्रीय मान्यताओं और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार शुक्रवार व्रत की चार प्रमुख कथाएँ सर्वाधिक प्रचलित हैं। प्रत्येक कथा का अपना विशिष्ट पारंपरिक आरंभ, विस्तृत घटनाक्रम और अंत में एक सिद्ध फल-श्रुति है। इस प्रपत्र में किसी भी प्रकार के आधुनिक दार्शनिक विश्लेषण, सामाजिक विवेचन या व्यक्तिगत टिप्पणी को पूर्णतः वर्जित रखा गया है। यह लेख केवल उस दिन पढ़ी जाने वाली विशुद्ध पारंपरिक व्रत-कथाओं पर केंद्रित है。

निम्नलिखित तालिका इन प्रमुख परंपराओं का संरचनात्मक विवरण और उनके अनिवार्य नियमों को स्पष्ट करती है:

व्रत का पारंपरिक नाम उपास्य देवी/देवता कथा के मुख्य पात्र व्रत का विशेष पारंपरिक एवं अनिवार्य नियम
संतोषी माता व्रत माता संतोषी निर्धन स्त्री (छोटी बहू) और उसका पति खटाई (खट्टे पदार्थों) का पूर्ण त्याग अनिवार्य; गुड़-चने का भोग
वैभव लक्ष्मी व्रत धनलक्ष्मी / श्री यंत्र शीला और उसका पति 11 या 21 शुक्रवार का संकल्प एवं 7, 11, 21 आदि पुस्तकों का वितरण
महालक्ष्मी व्रत माता लक्ष्मी / भगवान विष्णु निर्धन ब्राह्मण और उपले थापने वाली वृद्धा 16 दिन का व्रत एवं वृद्धा (देवी लक्ष्मी) का ससम्मान निमंत्रण 8
शुक्र देव व्रत शुक्र देवता धनराज-कुसुम / दो भाई शुक्र अस्त में बहू की विदाई का निषेध / धन का समान व न्यायपूर्ण बँटवारा

कथा-श्रवण का पारंपरिक नियम यह है कि कथा प्रारंभ होने से पूर्व श्रोता अपने हाथ में पुष्प, अक्षत (चावल) अथवा गुड़ और चना लेकर बैठते हैं। कथा के वाचन के दौरान प्रत्येक प्रसंग और अनुच्छेद की समाप्ति पर श्रोता श्रद्धापूर्वक 'हुंकार' (हाँ या ॐ का उच्चारण) भरते हैं । कथा की पूर्ण समाप्ति पर हाथ में ली गई यह पवित्र सामग्री देवी के चरणों में या स्थापित जल के कलश में अर्पित कर दी जाती है。

नीचे प्रत्येक प्रमुख कथा को उसके पूर्ण, अक्षुण्ण एवं शास्त्रीय/लोक-प्रचलित स्वरूप में पृथक-पृथक प्रस्तुत किया जा रहा है。


1. शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा (पूर्ण एवं पारंपरिक स्वरूप)

कथा का पारंपरिक प्रारंभ

यह कथा लगातार 16 शुक्रवार तक किए जाने वाले संतोषी माता व्रत के दौरान अनिवार्य रूप से पढ़ी जाती है। पूजा के पश्चात, एक स्वच्छ कलश पर कटोरी रखकर उसमें गुड़ और भुने हुए चने रखे जाते हैं । कथा श्रवण करने वाले सभी भक्त अपने हाथ में गुड़ और चना लेकर माता का ध्यान करते हैं । इस व्रत में सबसे कठोर नियम यह है कि व्रत करने वाले और उसके परिवार के सदस्यों को खटाई (नींबू, इमली, दही, अमचूर आदि) का स्पर्श और भक्षण पूर्णतः वर्जित है ।

पारंपरिक आरंभिक वाक्य: "एक समय की बात है, एक बुढ़िया थी। उसके सात बेटे थे..."

मुख्य कथा (अक्षुण्ण प्रस्तुति)

अति प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक बुढ़िया निवास करती थी। उसके सात बेटे थे, जिनमें से छह बेटे कामकाज करके धन कमाते थे, परंतु सातवाँ बेटा कोई काम नहीं करता था और घर में ही निठल्ला बैठा रहता था। बुढ़िया माता अपने छह कमाने वाले बेटों को रसोई में बैठाकर विविध प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन परोसती थी, और जब वे अपना भोजन कर लेते थे, तो उनकी बची हुई जूठन को एकत्र करके अपने सातवें बेटे को खिला देती थी । सातवाँ बेटा अत्यंत भोला और सीधा था। वह अपनी माता पर अगाध श्रद्धा रखता था और बिना कुछ कहे उस जूठन को ईश्वर का प्रसाद समझकर खा लेता था。

एक दिन सातवें बेटे की पत्नी (जिसे घर में छोटी बहू कहा जाता था) ने यह सब दृश्य छिपकर देख लिया। जब उसका पति भोजन करके उसके पास आया, तो उसने अपनी पत्नी से अत्यंत प्रेमपूर्वक कहा, "देखो प्रिये! मेरी माता मुझसे कितना अथाह प्रेम करती है। वह मुझे सबसे अंत में अत्यंत आराम और शांति से भोजन कराती है।"

यह सुनकर पत्नी की आँखों में अश्रुधारा बह निकली और उसने दुखी स्वर में कहा, "हे स्वामी! आप कितने भोले हैं। आपकी माता आपको कोई विशेष भोजन नहीं कराती, बल्कि वह तो आपको आपके छह भाइयों की बची हुई जूठन खिलाती है।" पति को अपनी पत्नी की इस बात पर तनिक भी विश्वास नहीं हुआ। उसने अपनी माता का पक्ष लेते हुए कहा कि माता कभी अपने पुत्र के साथ ऐसा नहीं कर सकती। पत्नी ने कहा, "यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो, तो कल किसी त्योहार के दिन आप स्वयं छिपकर अपनी आँखों से देख लेना।"

अगले दिन घर में एक बड़ा त्योहार था। घर में अनेक प्रकार के मिष्ठान और पकवान बने थे। सातवें बेटे ने अपनी पत्नी के कहे अनुसार सिर दर्द का बहाना किया और रसोई घर के पास ही एक पतले कपड़े से अपना मुँह ढँककर लेट गया। उसने उस कपड़े में एक छोटा सा छेद कर लिया ताकि वह सब कुछ स्पष्ट देख सके। कुछ समय पश्चात उसने देखा कि उसकी माता ने छह भाइयों को सुंदर आसनों पर बिठाया, उत्कृष्ट और ताज़ा भोजन कराया, और उनके उठने के बाद उनकी जूठी थालियों का अन्न और बचा हुआ भोजन एकत्र कर एक थाली में सजाया और उसे पुकारने लगी ।

अपनी आँखों से यह सब देखकर बेटे का हृदय छलनी हो गया। उसे भान हो गया कि घर में बिना कमाए मनुष्य का कोई मान-सम्मान नहीं होता। वह तुरंत अपने स्थान से उठा और अपनी माता से अत्यंत क्षुब्ध होकर बोला, "माता! आज तक मैंने तुम्हारा दिया हुआ अन्न प्रसाद समझकर ग्रहण किया, परंतु आज मेरे नेत्र खुल गए हैं। तुमने मुझे जूठन खिलाकर मेरा घोर अपमान किया है। अब मैं इस घर में एक पल भी नहीं रहूँगा और परदेश जाकर धन कमाऊँगा।" माता ने उसे बहुत समझाया, परंतु उसने एक न सुनी ।

जाते समय वह अपनी पत्नी के पास गया और अत्यंत भावुक होकर बोला, "हे प्रिये! मैं परदेश जा रहा हूँ। मुझे अपनी कोई निशानी दे दो ताकि मैं उसे देखकर तुम्हें स्मरण कर सकूँ।" पत्नी के पास देने के लिए कोई आभूषण या मूल्यवान वस्तु नहीं थी। वह उस समय आँगन में गोबर से लेपन कर रही थी। उसने रोते हुए अपने गोबर से सने हुए हाथों की छाप अपने पति की पीठ पर लगा दी और अपने नेत्रों में जल भरकर उसे विदा किया ।

वह युवक निरंतर चलता हुआ एक दूर देश के नगर में पहुँचा। वहाँ एक सेठ की कपड़े की बड़ी दुकान थी। उसने सेठ से जाकर नौकरी माँगी। सेठ ने उसकी स्थिति और मुख पर ईमानदारी देखकर उसे अपनी दुकान पर रख लिया। युवक ने दिन-रात अथक परिश्रम किया। वह सवेरे से लेकर देर रात तक दुकान का काम सँभालता। उसकी लगन, सत्यनिष्ठा और व्यापारिक बुद्धि से सेठ को व्यापार में अपार लाभ हुआ। कुछ ही महीनों में सेठ ने प्रसन्न होकर उसे अपने व्यापार में हिस्सेदार बना लिया और बारह वर्षों के भीतर वह उस नगर का एक अत्यंत धनाढ्य और नामी सेठ बन गया ।

उधर घर पर पति के जाने के पश्चात, सास और जिठानियों ने छोटी बहू पर घोर अत्याचार करना आरंभ कर दिया। वे उसे दिन भर घर का सारा कठोर कार्य सौंपतीं। उसे प्रतिदिन मीलों दूर घने जंगल में सूखी लकड़ियाँ काटने और लाने के लिए भेजा जाता। जब वह थक-हारकर लौटती, तो उसे भोजन के रूप में केवल जानवरों के खाने योग्य भूसे की रोटी दी जाती और पीने के लिए एक फूटे हुए नारियल के आवरण (खोल) में पानी दिया जाता था । छोटी बहू इस दारुण दुःख को मौन रहकर सहती और मन ही मन अपने पति की प्रतीक्षा करती रहती。

एक दिन जब वह लकड़ियाँ लेने जंगल जा रही थी, तो मार्ग में उसने देखा कि कुछ स्त्रियाँ एक स्थान पर एकत्रित होकर अत्यंत श्रद्धापूर्वक एक देवी का व्रत और पूजन कर रही हैं। उसने उत्सुकतापूर्वक उनके पास जाकर पूछा, "हे माताओ! आप यह किस देवी का व्रत कर रही हैं और इस व्रत के करने से किस फल की प्राप्ति होती है?"

स्त्रियों ने अत्यंत प्रेमभाव से उत्तर दिया, "पुत्री! हम संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। माता संतोषी भगवान श्री गणेश की पुत्री हैं और वे संतोष, सुख-शांति तथा वैभव की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह व्रत करने से मनुष्य की दरिद्रता, पारिवारिक कलह, अकाल मृत्यु, रोग और चिंताएँ दूर होती हैं। जो स्त्री यह व्रत करती है, उसका पति परदेश से सकुशल लौट आता है और माता की असीम कृपा से घर में धन-धान्य तथा संतान की प्राप्ति होती है।"

छोटी बहू ने उन स्त्रियों से इस चमत्कारी व्रत की पूर्ण विधि पूछी। स्त्रियों ने बताया, "यह व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार से आरंभ किया जाता है और लगातार 6 शुक्रवार तक नियमपूर्वक किया जाता है। पूजा में एक कलश स्थापित कर उस पर कटोरी में गुड़ और भुना हुआ चना रखा जाता है। इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य नियम यह है कि व्रत करने वाले और उसके पूरे परिवार को उस दिन किसी भी खट्टी वस्तु (खटाई) का ना तो स्पर्श करना चाहिए और ना ही सेवन करना चाहिए।"

यह विधि सुनकर छोटी बहू ने जंगल से लकड़ियाँ काटीं और उन्हें बाजार में बेचकर जो थोड़े से पैसे मिले, उनसे श्रद्धापूर्वक गुड़ और चना खरीदा। उसने उसी दिन से माता संतोषी का व्रत आरंभ कर दिया। वह मंदिर में गई और माता के सम्मुख फूट-फूट कर रोते हुए प्रार्थना करने लगी, "हे जगन्माता! मेरी रक्षा करें, मेरे कष्टों का निवारण करें और मेरे पति को परदेश से वापस ले आएँ।"

माता संतोषी उस दुखी स्त्री की सच्ची भक्ति पर अत्यंत प्रसन्न हुईं। माता की चमत्कारिक कृपा से उसी दिन उसके पति के पास से एक पत्र और घर चलाने के लिए कुछ धन आया। छोटी बहू का माता के प्रति विश्वास और भी दृढ़ हो गया और उसका उत्साह बढ़ गया。

कुछ समय पश्चात, माता संतोषी ने परदेश में सुख-वैभव में सो रहे उसके पति के स्वप्न में साक्षात् दर्शन दिए। माता ने क्रोधित होकर कहा, "अरे मूर्ख! तू यहाँ अपार वैभव में सो रहा है और तेरी पतिव्रता पत्नी वहाँ तेरी अनुपस्थिति में भूसे की रोटी खा रही है। तेरी माता और भाभियाँ उस पर घोर अत्याचार कर रही हैं। उठ और तुरंत अपने घर जा।"。

पति ने स्वप्न में ही हाथ जोड़कर कहा, "हे माता! मेरा व्यापार बहुत विस्तृत हो गया है। मुझे यहाँ का सारा हिसाब-किताब करने और धन समेटने में बहुत समय लगेगा।" माता ने आश्वासन देते हुए कहा, "तू कल सुबह उठकर स्नान करके मेरी पूजा करना। मेरी कृपा से तेरा सारा काम तुरंत पूर्ण हो जाएगा।" पति ने प्रातःकाल उठकर वैसा ही किया और आश्चर्यजनक रूप से उसका सारा व्यापार सरलता से समेट लिया गया। वह बहुत सा धन, आभूषण और सेवक लेकर अपने गाँव की ओर चल पड़ा。

जब वह अपने गाँव पहुँचा, तो उसने देखा कि उसकी पत्नी नदी के किनारे लकड़ियों का गट्ठर लिए, अत्यंत फटे-पुराने वस्त्रों में और दुर्बल अवस्था में खड़ी है। वह अपनी पत्नी की यह दारुण दशा देखकर रो पड़ा। उसने अपनी पत्नी से कहा, "हे प्रिये! तुम यह लकड़ियों का गट्ठर यहीं छोड़ दो और मेरे साथ घर चलो।" घर पहुँचकर उसने अपनी माता से स्पष्ट कह दिया कि वह अब अलग रहेगा, क्योंकि उसने अपनी पत्नी पर हुए अत्याचारों का पूरा वृत्तांत जान लिया था। उसने माता संतोषी की असीम कृपा से गाँव में एक अत्यंत भव्य महल का निर्माण करवाया और अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।

समय व्यतीत होता गया और अब छोटी बहू के 16 शुक्रवार पूर्ण हो चुके थे। व्रत के विधान के अनुसार उसे उद्यापन करना था। उसने अपने पति की आज्ञा लेकर उद्यापन की भव्य तैयारी की और अपनी जिठानियों के बच्चों को (बालकों को) भोजन के लिए ससम्मान आमंत्रित किया ।

परंतु जिठानियों के मन में अभी भी ईर्ष्या और द्वेष की अग्नि धधक रही थी। जब उन्होंने देखा कि छोटी बहू इतनी संपन्न हो गई है, तो उन्होंने अपने बच्चों को घर से ही सिखा दिया कि भोजन के समय वे किसी भी तरह खटाई (खट्टी वस्तु) अवश्य माँगें, ताकि छोटी बहू का व्रत भंग हो जाए और उसका उद्यापन पूर्ण न हो सके ।

जब बच्चे छोटी बहू के घर भोजन करने बैठे, तो उन्होंने पेट भर खीर-पूरी खाई। परंतु जब भोजन समाप्त हुआ और जाने का समय आया, तो वे हठ करने लगे, "हमें यह मीठी खीर नहीं भाती, इसे खाकर हमें अरुचि हो रही है। हमें कुछ खटाई चाहिए।" छोटी बहू ने उन्हें बहुत समझाया कि आज माता संतोषी के व्रत का उद्यापन है, आज के दिन खटाई किसी भी रूप में नहीं दी जा सकती। परंतु बच्चे नहीं माने और वे पैसे माँगने लगे। भोली और अज्ञानी बहू ने यह सोचकर कि पैसों से कोई दोष नहीं होगा, बच्चों को पैसे दे दिए। बच्चों ने बाहर जाकर उसी समय उन पैसों से इमली खरीदी और खाने लगे ।

इस नियम-भंग और खटाई के सेवन के कारण माता संतोषी अत्यंत क्रोधित हो गईं। उद्यापन खंडित हो गया। उसी समय राजा के दूत घर में आए और छोटी बहू के पति को किसी झूठे आरोप में पकड़कर राजा के कारागार (जेल) में ले गए । यह देखकर जिठानियाँ ताने मारने लगीं कि यह अवश्य लूट का धन लाया होगा, अब जीवन भर जेल की चक्की पीसेगा。

छोटी बहू इस अचानक आए आघात को सहन न कर सकी। वह रोती-रोती माता संतोषी के मंदिर में दौड़ी गई और माता के चरण कसकर पकड़ लिए। उसने विलाप करते हुए अत्यंत करुण स्वर में कहा, "हे माता! हम मूर्ख हैं, हम अज्ञानी हैं, पापी हैं। आपके व्रत की पूर्ण विधि हम नहीं जानते। आपका व्रत भंग कर हमने बहुत बड़ा अपराध किया है। हे जगन्माता! आप हमारा अपराध क्षमा करें, हमारा अपराध क्षमा करें।" ।

उसकी सच्ची प्रार्थना और पश्चाताप सुनकर माता संतोषी ने एक वृद्धा का रूप धारण किया और उसे दर्शन देकर कहा, "पुत्री! तूने उद्यापन में अज्ञानतावश भूल की थी। तूने बच्चों को पैसे दिए जिससे उन्होंने खटाई खाई, इसी कारण यह विपत्ति तेरे घर आई है। तू शोक मत कर, अगले शुक्रवार को पुनः श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर सही विधि से उद्यापन कर, तेरा पति ससम्मान वापस आ जाएगा।"。

छोटी बहू ने माता की आज्ञा शिरोधार्य की और अगले शुक्रवार को पुनः पूर्ण निष्ठा से व्रत रखा। इस बार उसने जिठानियों के बच्चों के स्थान पर ब्राह्मणों के बालकों को बुलाकर भोजन कराया और यथाशक्ति दक्षिणा में उन्हें फल दिए (पैसे नहीं दिए) । माता संतोषी इस बार पूर्ण रूप से प्रसन्न हुईं。

चमत्कार स्वरूप उसी समय राजा को स्वप्न आया और वास्तविक अपराधियों का पता चला। राजा को ज्ञात हुआ कि उसका पति निर्दोष है। राजा ने उसे तुरंत ससम्मान कारागार से मुक्त कर दिया और अपनी ओर से बहुत सा धन और वस्त्राभूषण देकर विदा किया। घर लौटकर जब पति ने प्रवेश किया तो घर में खुशियाँ छा गईं। इसके पश्चात छोटी बहू और उसका पति माता संतोषी की कृपा से अपार धन-धान्य, पुत्र और सुख-सौभाग्य प्राप्त कर आनंदपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे。

एक दिन सास को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ। वह अपनी बहू के घर आई। बहू रौशनदान में से देख रही थी, प्रसन्नता से पगली बनकर चिल्लाने लगी- "आज मेरी माता जी मेरे घर आई हैं।" वह उतावली में अपने बच्चे को दूध पीने से हटाकर सास के स्वागत के लिए दौड़ी। सास ने यह देखा तो उसका क्रोध फूट पड़ा। वह बोली, "रांड, मुझे देखकर क्या उतावली हुई है जो बच्चे को पटक दिया?" इतने में माता संतोषी के प्रताप से घर में जहाँ देखो वहीं लड़के ही लड़के (पौत्र ही पौत्र) नजर आने लगे। बहू बोली, "माता जी! मैं जिनका व्रत करती हूँ, यह वही संतोषी माता का प्रताप है।" इतना कहकर उसने झट से सारे घर के किवाड़ (दरवाजे) खोल दिए। सबने माता जी के चरण पकड़ लिए और विनती कर क्षमा माँगी ।

पारंपरिक उपसंहार (फल-श्रुति)

संतोषी माता की कथा के अंत में पारंपरिक रूप से वाचक द्वारा यह फल-वचन कहा जाता है, जिसे सभी श्रोता हाथ जोड़कर सुनते हैं: "हे संतोषी माता! जिस प्रकार आपने उस छोटी बहू पर कृपा की, उसका मनोरथ पूर्ण किया, उसके सभी कष्ट दूर किए और उसे अखंड सुख-सौभाग्य प्रदान किया, वैसा ही फल माता सबको दे। जो इस कथा को पढ़े, उसका मनोरथ पूर्ण हो। जो श्रद्धा से सुने, उसकी सभी मनोकामना पूर्ण हो। जो इस कहानी को कहते, सुनते और हुंकार भरते हैं, उन सब पर अपनी कृपा करना और सबके घर को अन्न-धन के भंडार से भरना।"

(कथा के अंत में सभी भक्त एक स्वर में उद्घोष करते हैं - "बोलिए संतोषी माता की जय!")


2. शुक्रवार वैभव लक्ष्मी व्रत कथा (पारंपरिक और शास्त्रीय स्वरूप)

कथा का पारंपरिक प्रारंभ

यह कथा शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के 'धनलक्ष्मी' और 'वैभव लक्ष्मी' स्वरूप को प्रसन्न करने, दरिद्रता का नाश करने और घर में सुख-शांति स्थापित करने के लिए पढ़ी जाती है। व्रत का पालन करने वाले जातक (विशेषकर विवाहित महिलाएँ) 11 या 21 शुक्रवार का संकल्प लेते हैं । पूजा में लाल वस्त्र पर श्री यंत्र और माता लक्ष्मी की छवि स्थापित कर स्वर्ण या रजत आभूषणों की पूजा की जाती है ।

पारंपरिक आरंभिक वाक्य: "किसी बड़े शहर में लाखों लोग रहते थे..."

मुख्य कथा (अक्षुण्ण प्रस्तुति)

प्राचीन काल की बात है, एक बहुत बड़ा नगर था जिसमें लाखों की संख्या में लोग निवास करते थे। समय के साथ उस नगर के लोगों में भौतिकता की दौड़, लालच और स्वार्थ इतना अधिक बढ़ गया कि वे ईश्वर की सच्ची भक्ति, दया, धर्म और परोपकार के मार्ग को पूरी तरह भूल गए । नगर में चारों ओर मदिरापान, जुआ, चोरी, धोखेबाजी और पापाचार जैसी बुराइयाँ हावी हो गईं थीं । लोग केवल धन कमाने के अनुचित मार्गों में लिप्त रहते थे。

इसी नगर में एक अत्यंत सुशील, धार्मिक और सदाचारी स्त्री रहती थी, जिसका नाम शीला था । शीला और उसका पति बहुत ही संतोषी स्वभाव के थे। वे प्रतिदिन भगवान की पूजा-पाठ करते, अतिथियों का सत्कार करते और पूरी ईमानदारी से अपना जीवन व्यतीत करते थे। पूरे नगर में उनके आदर्श गृहस्थ जीवन की और शीला के सतीत्व की सर्वत्र प्रशंसा होती थी ।

परंतु विधाता का लेख और भाग्य चक्र जब बदलता है, तो मनुष्य की मति भी भ्रष्ट हो जाती है। पूर्व जन्म के किसी संचित कर्म अथवा बुरी संगति के प्रभाव से शीला के पति के मन में रातों-रात करोड़पति बनने का प्रबल लालच उत्पन्न हो गया । गलत लोगों की संगति में आकर वह बुरी आदतों का शिकार हो गया। उसने जुआ खेलना (रेस और सट्टा) और मदिरापान करना आरंभ कर दिया । वह घर का सारा धन बाहर जुए में लुटाने लगा。

दिन-रात इन गलत कार्यों में धन लुटाने के कारण धीरे-धीरे उनके घर की सारी संपत्ति, संचित धन-दौलत नष्ट हो गई। यहाँ तक कि शीला के जो भी स्वर्ण और रजत के आभूषण थे, वे सब भी उसके पति ने गिरवी रख दिए । घर में खाने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं बचा और वे एक भिखारी के समान अत्यंत दरिद्र अवस्था में पहुँच गए । जो लोग कल तक उनके आदर्शों की प्रशंसा करते थे, वे भी उनसे दूर हो गए。

शीला अपने परिवार की यह दुर्दशा देखकर अत्यंत दुखी रहती थी। वह रात-दिन आँसू बहाती, परंतु वह भगवान की अनन्य भक्त थी, इसलिए उसने कठिन समय में भी धैर्य नहीं छोड़ा। एक शुक्रवार के दिन, जब शीला अपने घर के द्वार पर अत्यंत उदास और निराश बैठी थी, तभी एक अत्यंत तेजस्विनी, शांत और करुणामयी वृद्धा उसके द्वार पर आई। वृद्धा के मुख पर अलौकिक तेज था, मानो साक्षात् सूर्य का प्रकाश उनके मुखमंडल से छलक रहा हो । वह वृद्धा वास्तव में और कोई नहीं, स्वयं माता महालक्ष्मी थीं जो शीला की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर उसके कष्टों का निवारण करने आई थीं ।

वृद्धा ने शीला के पास आकर अत्यंत मधुर स्वर में उसके दुःख का कारण पूछा। शीला ने वृद्धा को एक देवी स्वरूप मानकर रोते हुए अपनी सारी व्यथा, पति का पतन और घर की दरिद्रता का वृत्तांत कह सुनाया। वृद्धा ने उसे स्नेहपूर्वक सांत्वना दी और कहा, "पुत्री! तू निराश मत हो। तू देवी लक्ष्मी का चमत्कारी 'वैभव लक्ष्मी व्रत' कर। यह व्रत अत्यंत प्रभावशाली है। इसके करने से सारी दरिद्रता दूर होती है, खोया हुआ धन वापस मिलता है और घर में सुख-शांति लौट आती है।" शीला ने हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक उस व्रत की शास्त्रोक्त विधि पूछी ।

वृद्धा (माता लक्ष्मी) ने विधि बताते हुए कहा, "पुत्री, यह व्रत शुक्रवार के दिन किया जाता है। अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए 11 या 21 शुक्रवार तक इस अनुष्ठान को करने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए । शुक्रवार को प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूरे दिन मन ही मन 'जय माँ लक्ष्मी' या 'जय देवी लक्ष्मी' का जाप करें । संध्याकाल (प्रदोष काल) के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता के 'श्री यंत्र' और 'धनलक्ष्मी' स्वरूप की स्थापना करें । उन पर एक श्रीफल (नारियल) अर्पित करें और स्वर्ण या रजत के आभूषण (यदि न हो तो सिक्का) रखकर उनकी पूजा करें। देवी को मीठा प्रसाद (विशेषकर खीर) चढ़ाएँ और व्रत की कथा अवश्य पढ़ें या सुनें । इस दिन पूर्ण उपवास रखें, फलाहार करें या केवल एक बार ही अन्न ग्रहण करें । यदि परिवार में सूतक (मृत्यु) या मासिक धर्म की स्थिति हो, तो उस शुक्रवार को छोड़कर अगले शुक्रवार को व्रत करें।"

वृद्धा के निर्देशानुसार शीला के मन में आशा की किरण जागी। उसने पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और भक्ति-भाव से अगले ही शुक्रवार से वैभव लक्ष्मी व्रत आरंभ किया । उसने 21 शुक्रवार का संकल्प लिया और बताई गई विधि-विधान से माता लक्ष्मी की उपासना आरंभ कर दी。

व्रत के चमत्कारिक प्रभाव से कुछ ही सप्ताहों में शीला के पति की बुद्धि शुद्ध होने लगी। उसका मन जुए और शराब की बुरी संगति से हट गया और वह पुनः एक अच्छा, कर्मठ और सज्जन मनुष्य बन गया । उसने व्यसनों को त्यागकर कठोर परिश्रम करते हुए अपना व्यापार पुनः आरंभ किया। माता लक्ष्मी की असीम कृपा से उसके व्यापार में दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति हुई और उसे भारी मुनाफा हुआ ।

कुछ ही समय में उसने शीला के वे सभी आभूषण छुड़ा लिए जो उसने अपनी बुरी आदतों के कारण गिरवी रखे थे । शीला के घर में पहले से भी अधिक धन, संपत्ति, शांति और सुख-वैभव वापस आ गया ।

जब शीला के संकल्पित 21 शुक्रवार पूर्ण हो गए, तो उसने व्रत का उद्यापन किया। उद्यापन की शास्त्रोक्त विधि के अनुसार, उसने पूजा के बाद कम से कम सात (या अपनी सामर्थ्य अनुसार 11, 21, 51 या 101) कुंवारी कन्याओं और सौभाग्यशाली स्त्रियों को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया । उसने सभी को कुमकुम का तिलक लगाया, आदरपूर्वक खीर का प्रसाद खिलाया और माता लक्ष्मी के व्रत के प्रचार-प्रसार के लिए 'वैभव लक्ष्मी व्रत कथा' की पुस्तकें ससम्मान उपहार में भेंट कीं ।

शीला के जीवन में इस अद्भुत चमत्कार और वैभव की वापसी को देखकर मोहल्ले और नगर की अन्य स्त्रियों ने भी आश्चर्यचकित होकर शीला से इस व्रत का विधान पूछा और उन्होंने भी शास्त्रोक्त विधि से वैभव लक्ष्मी व्रत का पालन करना आरंभ कर दिया ।

पारंपरिक उपसंहार (फल-श्रुति)

कथा पूर्ण होने के पश्चात, व्रत करने वाला साधक माता के धनलक्ष्मी स्वरूप की छवि को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता है और मन ही मन यह प्रार्थना (फल-श्रुति) पढ़ता है:

"हे माँ धनलक्ष्मी! हे माँ वैभव लक्ष्मी! मैंने सच्चे हृदय से आपका व्रत पूर्ण किया है। आज जो मैंने मन्नत माँगी थी, वह पूरी हो जाए। हमारी हर विपत्ति को दूर करो और हम सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो उसे संतान देना, सौभाग्यशाली स्त्रियों का सौभाग्य अखंड रखना, और कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य मनभावन वर देना। हे माँ! जो भी आपका यह चमत्कारी वैभव लक्ष्मी व्रत करे, उसकी सभी विपत्तियाँ दूर करना। जैसी कृपा आपने शीला पर की और उसके घर को वैभव से भर दिया, वैसी ही कृपा हम सब पर और इस कथा को पढ़ने और सुनने वालों पर करना। आपकी महिमा अपरंपार है। माता जी की जय हो!"

(इसके पश्चात माँ महालक्ष्मी की पारंपरिक आरती की जाती है।)


3. शुक्रवार महालक्ष्मी व्रत कथा (निर्धन ब्राह्मण और उपले थापने वाली वृद्धा)

कथा का पारंपरिक प्रारंभ

यह कथा शुक्रवार के दिन और विशेष रूप से 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत के संदर्भ में पढ़ी जाती है। यह भगवान विष्णु द्वारा अपने परम भक्त को देवी लक्ष्मी की प्राप्ति का साक्षात् मार्ग बताने का अत्यंत पवित्र पौराणिक प्रसंग है ।

पारंपरिक आरंभिक वाक्य: "प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था..."

मुख्य कथा (अक्षुण्ण प्रस्तुति)

प्राचीन काल में एक गाँव में एक ब्राह्मण निवास करता था। वह भगवान विष्णु का अनन्य और निष्ठावान भक्त था। वह प्रतिदिन पूरी श्रद्धा, नियम और संयम के साथ भगवान विष्णु की आराधना करता था। परंतु, सांसारिक दृष्टि से वह अत्यंत निर्धन था। उसके घर में पहनने को स्वच्छ वस्त्र और खाने को अन्न का सदैव अभाव रहता था। कई बार तो उसे और उसके परिवार को भूखे पेट ही सोना पड़ता था ।

अपने भक्त के इस घोर कष्ट और दारिद्र्य को देखकर भगवान विष्णु का हृदय द्रवित हो उठा। एक दिन भगवान विष्णु ने स्वयं प्रकट होकर उस निर्धन ब्राह्मण को दर्शन दिए । अपने आराध्य को साक्षात् सम्मुख देखकर ब्राह्मण कृतार्थ हो गया। उसने भगवान विष्णु के चरण पकड़ लिए और रोते हुए अपनी निर्धनता दूर करने की करुण प्रार्थना की。

भगवान विष्णु ने उसे देवी लक्ष्मी की प्राप्ति का अचूक मार्ग बताते हुए कहा, "हे ब्राह्मण! तू शोक मत कर। तेरे गाँव के मंदिर के सामने प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से बहुत पहले (ब्रह्म मुहूर्त में) एक वृद्ध स्त्री आती है। वह मंदिर के प्रांगण में आकर उपले (गोबर के कंडे) थापती है। तुम कल सुबह जल्दी उठकर मंदिर के द्वार पर जाकर छिपकर बैठ जाना। जब वह स्त्री आए, तो तुम जाकर उस स्त्री को अपने घर आने के लिए ससम्मान आमंत्रित करना।"

विष्णु जी ने आगे कहा, "वह वृद्ध स्त्री कोई साधारण स्त्री नहीं है, बल्कि स्वयं धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का रूप है। अगर वह स्त्री तुम्हारे निमंत्रण को स्वीकार करके तुम्हारे घर में आ गई, तो समझ लेना कि तुम्हारा घर हमेशा के लिए धन और धान्य से भर जाएगा और तुम्हारी पीढ़ियों की दरिद्रता सदा के लिए मिट जाएगी।" इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए ।

अगले दिन, ब्राह्मण विष्णु जी के कहे अनुसार प्रातः 4:00 बजे (ब्रह्म मुहूर्त) ही उठकर मंदिर के द्वार पर जाकर बैठ गया । चारों ओर घना अंधकार था। कुछ ही समय पश्चात, अंधेरे में एक अत्यंत तेजोमयी वृद्ध स्त्री गोबर लेकर आई और मंदिर के प्रांगण में उपले थापने लगी。

ब्राह्मण तुरंत उठा और उस स्त्री के पास गया। उसने हाथ जोड़कर साष्टांग प्रणाम किया और अत्यंत विनम्रता से उस वृद्ध स्त्री को अपने घर पधारने का निमंत्रण दे दिया । जब ब्राह्मण ने पूरी श्रद्धा के साथ माता लक्ष्मी को अपने घर आने को कहा, तो देवी लक्ष्मी अपनी दिव्य दृष्टि से तुरंत समझ गईं कि इस निर्धन ब्राह्मण को ऐसा करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने ही निर्देशित किया है ।

लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण से कहा, "हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारे घर अवश्य आऊँगी, परंतु उसके लिए तुम्हें एक अनुष्ठान करना होगा। तुम महालक्ष्मी व्रत का संकल्प लो। यह व्रत 16 दिनों तक किया जाता है। तुम्हें 16 दिनों तक नियम और संयम से मेरी पूजा करनी होगी, और 16 रातों तक चंद्रमा के उदय होने पर उसे अर्घ्य देना होगा। ऐसा करने से तुम्हारी इच्छा जल्द ही पूर्ण हो जाएगी।"

उस ब्राह्मण ने माता लक्ष्मी के आदेशानुसार 16 दिनों के महालक्ष्मी व्रत का संकल्प लिया। उसने अत्यंत निष्ठापूर्वक व्रत किया। प्रतिदिन उत्तर दिशा की ओर मुख करके लक्ष्मी जी का आवाहन किया और उन्हें पुकारा ।

ब्राह्मण की इस कठोर तपस्या और अगाध भक्ति को देखकर माता महालक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हुईं। जब 16 दिन पूर्ण हुए, तो देवी लक्ष्मी ने अपना वचन निभाया। वे उस निर्धन ब्राह्मण के घर पधारीं। उनके चरण पड़ते ही ब्राह्मण की टूटी हुई झोपड़ी एक विशाल महल में परिवर्तित हो गई। माता ने उसके घर को अपार धन, वैभव, स्वर्ण और धान्य से परिपूर्ण कर दिया । वह ब्राह्मण जो दाने-दाने को मोहताज था, वह महालक्ष्मी की कृपा से असीम ऐश्वर्य का स्वामी बन गया और अपना शेष जीवन सुख-समृद्धि और विष्णु-भक्ति में व्यतीत करने लगा。

पारंपरिक उपसंहार (फल-श्रुति)

कथा के अंत में कथा-वाचक द्वारा यह फल-वचन कहा जाता है: "हे माता महालक्ष्मी! जैसे आपने उस निर्धन ब्राह्मण का निमंत्रण स्वीकार किया और उसके घर को धन-धान्य से भर दिया, उसकी सारी इच्छाएँ पूरी कीं, वैसे ही इस कहानी को कहते, सुनते और हुंकार भरते हुए जो कोई सच्चे मन से आपका यह व्रत करता है, उसके घर के अन्न-धन के भंडार भर देना और उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करना।"

(कथा पूर्ण होने के बाद हाथ में लिए गए फूल और चावल लक्ष्मी जी के चरणों में समर्पित कर दिए जाते हैं) ।


4. शुक्रवार व्रत कथा: शुक्र देव की पौराणिक कथाएँ

शुक्रवार के दिन नवग्रहों में धन, ऐश्वर्य, कला और वैवाहिक सुख के कारक ग्रह 'शुक्र देव' के निमित्त भी व्रत किया जाता है। शुक्र देव की कृपा प्राप्ति और प्रकोप शांति के लिए दो प्रमुख कथाएँ लोक-परंपरा में अत्यंत प्रचलित हैं । दोनों कथाओं का वाचन अक्षुण्ण रूप से नीचे दिया जा रहा है。

संस्करण अ: धनराज और कुसुम की कथा (शुक्र अस्त का निषेध)

पारंपरिक प्रसंग: यह कथा शुक्र देव के प्रकोप और उनके व्रत के महत्व को दर्शाती है, विशेषकर जब ज्योतिषीय रूप से 'शुक्र अस्त' होता है ।

मुख्य कथा (अक्षुण्ण प्रस्तुति): प्राचीन काल में एक अत्यंत धनी सेठ रहता था। उसके एक ही पुत्र था, जिसका नाम धनराज था। धनराज का विवाह कुसुम नाम की एक अत्यंत सुंदर और सुशील कन्या से हुआ था । विवाह के पश्चात कुसुम कुछ समय के लिए अपने मायके (पिता के घर) गई हुई थी。

कुछ समय बीतने पर धनराज ने अपनी पत्नी को वापस लाने का निश्चय किया। उसने अपने माता-पिता से कहा कि वह कुसुम को विदा कराकर लाने जा रहा है। उस समय नगर के ज्योतिषियों और पंडितों ने पंचांग की गणना करके बताया कि वर्तमान समय में आकाश में 'शुक्र अस्त' चल रहा है । शास्त्रों के अनुसार, शुक्र अस्त होने की अवधि में नई बहू की विदाई कराना अत्यंत अशुभ और विनाशकारी माना जाता है。

माता-पिता ने धनराज को बहुत समझाया कि अभी शुक्र देवता अस्त हैं, इसलिए वह कुछ दिन रुक जाए, परंतु धनराज ने युवावस्था के हठ में आकर किसी की बात नहीं मानी। वह अपनी ससुराल पहुँच गया। वहाँ भी कुसुम के माता-पिता ने शुक्र अस्त होने का हवाला देते हुए विदाई से स्पष्ट मना किया, परंतु धनराज अपने हठ पर अड़ा रहा। विवश होकर कुसुम के माता-पिता को भारी मन से अपनी पुत्री की विदाई करनी पड़ी ।

जब धनराज और कुसुम लौट रहे थे, तो मार्ग में एक सुनसान जंगल से गुजरते समय उन्हें भयानक डाकुओं ने घेर लिया। डाकुओं ने धनराज का सारा धन-संपत्ति और कुसुम के सारे स्वर्ण आभूषण लूट लिए और दोनों को बुरी तरह घायल कर दिया । किसी तरह मरते-गिरते दोनों अपने घर पहुँचे。

परंतु शुक्र देव का प्रकोप यहीं शांत नहीं हुआ। घर पहुँचने के बाद जब धनराज अपने बिस्तर पर आराम कर रहा था, तभी एक विषैला साँप उसके बिस्तर पर चढ़ गया और उसने धनराज को डँस लिया । सेठ ने बड़े-बड़े वैद्य और चिकित्सक बुलाए, अनेक सिद्ध औषधियाँ दी गईं, लेकिन कोई भी प्रयास सफल नहीं हुआ और धनराज की मृत्यु हो गई ।

घर में कोहराम मच गया। तब पंडितों ने सेठ से कहा, "सेठ जी! आपके बेटे ने शुक्र अस्त होने पर बहू को विदा करा लाने की घोर भूल की है। यह सब शुक्र देव के प्रबल क्रोध का परिणाम है। यदि आप शुक्रवार की विधिवत पूजा-अर्चना करें और आपकी पुत्रवधू (बहू) शुक्रवार का व्रत करके कथा सुनकर प्रसाद ग्रहण करे, तो शुक्र देवता की अनुकंपा से आपका बेटा धनराज पुनः जीवित हो सकता है।"

सेठ ने पंडितों की बात मानकर अपने मृत बेटे के शरीर को सुरक्षित रखा और अपनी बहू कुसुम को वापस उसके मायके भेज दिया। कुसुम ने अपने घर पहुँचकर अत्यंत भक्ति-भाव से शुक्रवार का व्रत और शुक्र देव की पूजा-पाठ आरंभ की । उसने हाथ जोड़कर अपने पति की भूल और हठ के लिए शुक्र देवता से क्षमा माँगी। उसकी सच्ची श्रद्धा और अश्रुपूर्ण प्रार्थना से शुक्र देव का हृदय पिघल गया और वे प्रसन्न हो गए。

व्रत के प्रभाव से अद्भुत चमत्कार हुआ और मृत धनराज निद्रा से जागने के समान उठ बैठा । धनराज के जीवित हो जाने का समाचार जब उसके माता-पिता के पास पहुँचा, तो उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। इस चमत्कार को देखकर धनराज के माता-पिता ने भी शुक्रवार का व्रत किया और गरीबों को अन्न, वस्त्र और धन का दान दिया ।

कुछ दिनों बाद जब पंचांग के अनुसार 'शुक्र उदय' हुआ, तब धनराज पुनः ससुराल गया और शुभ मुहूर्त में अपनी पत्नी कुसुम के साथ ससम्मान घर लौट आया । इसके पश्चात दोनों पति-पत्नी जीवन भर नियमपूर्वक प्रत्येक शुक्रवार का विधिवत व्रत करते हुए शुक्र देव की पूजा करने लगे。

संस्करण ब: दो भाइयों के बँटवारे की कथा (भेदभाव और न्याय)

पारंपरिक प्रसंग: यह कथा परिवार में धन के न्यायपूर्ण बँटवारे और शुक्र देव द्वारा ली जाने वाली प्रत्यक्ष परीक्षा पर आधारित है ।

मुख्य कथा (अक्षुण्ण प्रस्तुति): एक नगर में दो सगे भाई रहते थे। माता-पिता की मृत्यु के बाद दोनों भाइयों में पैतृक संपत्ति को लेकर भयंकर विवाद हो गया और वे अलग-अलग हो गए। परंतु बँटवारे के समय बड़े भाई ने बेईमानी की और सारी बहुमूल्य संपत्ति, धन और आभूषण हड़प लिए। छोटा भाई अत्यंत निर्धन हो गया और बहुत कष्ट में अपना जीवन व्यतीत करने लगा ।

एक दिन स्वयं शुक्र देव महाराज भेष बदलकर पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे। वे परीक्षा लेने के लिए उस छोटे निर्धन भाई के घर गए। छोटे भाई ने अपनी दरिद्रता के बावजूद अतिथि को देव स्वरूप मानकर उनका अत्यंत सत्कार किया। शुक्र देव उसके सेवाभाव से बहुत प्रसन्न हुए। जब वे वहाँ से गए, तो उनके चमत्कार से उस छोटे भाई का पूरा घर सोने (स्वर्ण) से भर गया । छोटा भाई रातों-रात अत्यंत धनवान हो गया。

जब बड़े भाई की पत्नी (ब्राह्मणी) को यह बात पता चली, तो उसके मन में भारी लालच आ गया। उसने अपने पति को तुरंत तालाब के तट पर भेजा जहाँ शुक्र देव महाराज स्नान कर रहे थे । बड़े भाई ने शुक्र देव को अत्यंत अनुनय-विनय करके अपने घर आमंत्रित किया। शुक्र देव उसके घर पहुँचे。

रात को शुक्र देव को सोने के लिए घर का सबसे सुंदर कमरा दिया गया। परंतु रात में शुक्र देव ने एक विचित्र चमत्कार किया। उन्होंने उस कमरे के चारों कोनों में शौच (मल-त्याग) कर दिया । इतना ही नहीं, जो उत्तम रेशमी साड़ी बड़े भाई की पत्नी ने सफाई के लिए (या बिछाने के लिए) दी थी, उसका भी उपयोग कर लिया। सुबह होते ही शुक्र देव चुपचाप वह कमरा खोलकर चले गए。

जब घर वालों ने दरवाजा खोला, तो पूरा कमरा अत्यंत भयानक दुर्गंध से भभक रहा था और पूरे घर में बदबू फैल गई । ब्राह्मणी अत्यंत क्रोधित हुई और उसने तुरंत अपने पति को शुक्र देव के पीछे भेजा。

बड़ा भाई भागता हुआ तालाब के तट पर पहुँचा। शुक्र देव तट पर ही विराजमान थे। बड़े भाई ने हाथ जोड़कर पूछा, "महाराज! आपने मेरे छोटे भाई के घर में तो सोना ही सोना कर दिया और मेरे घर में शौच (मल) क्यों कर दिया? यह कैसा न्याय है?"

शुक्र देव महाराज ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "अरे मूर्ख! तुम दोनों सगे भाई थे। जब तुम भाई-भाई अलग हुए, तो संपत्ति का बराबर बँटवारा करने के बदले तुमने उसका पूरा धन और हिस्सा हड़प लिया। तुमने उसके साथ घोर बेईमानी की, जिसके कारण उसका घर खाली हो गया। मैंने उसे उसका हक़ दिया। तुम्हारे घर में जो अन्याय और बेईमानी का धन पड़ा है, वह उस मल के समान ही दुर्गंधयुक्त है।"

शुक्र देव ने आगे कहा, "यदि तू अभी भी धन और संपत्ति का न्यायपूर्वक बँटवारा कर दे और अपने भाई को उसका हिस्सा दे दे, तो तेरे घर का वह मल भी स्वर्ण बन जाएगा और तेरा घर भी सोने से भर जाएगा। घर में से यह भेदभाव मिटा दे, ऐसा करने में ही तेरी भलाई है।"

बड़े भाई की आँखें खुल गईं और उसे अपनी भारी भूल का भान हो गया। उसने तुरंत घर जाकर शुक्र देव का कहना माना। उसने सुई तक का बँटवारा बिल्कुल आधा-आधा किया और अपने भाई को उसका पूरा हक़ ससम्मान लौटा दिया । जैसे ही उसने यह किया, शुक्र देव की कृपा से उसके घर में भी नव-निधि का निवास हो गया और वह मल स्वर्ण में परिवर्तित हो गया । इसके पश्चात दोनों भाई प्रेम से रहने लगे और नियमित रूप से शुक्र देव का व्रत करने लगे。

(लोक-परंपरा में शुक्र देव व्रत के अंतर्गत एक अन्य संक्षिप्त प्रसंग भी पढ़ा जाता है जहाँ एक सास अपनी बहू से ईर्ष्या करके पनिहारन के माध्यम से शुक्र देव की मूर्ति को घर के आँगन में गड्ढा खोदकर गाड़ देती है। घर में दरिद्रता छा जाती है। बाद में उसे अपनी भूल का पछतावा होता है, वह मूर्ति को बाहर निकालकर नहला-धुलाकर मंदिर में विराजमान करती है, जिससे शुक्र देव प्रसन्न होकर घर को पुनः धन-धान्य से भर देते हैं।)

पारंपरिक उपसंहार (फल-श्रुति)

इन कथाओं के अंत में शुक्र देव से यह प्रार्थना की जाती है: "हे शुक्र देव महाराज! जैसी कृपा आपने छोटे भाई और धनराज-कुसुम पर की, और जैसी क्षमा आपने बड़े भाई तथा सास को दी, वैसी कृपा इस कहानी को कहने, सुनने और हुंकार भरने वाले प्रत्येक जन पर करना। सबके अन्न-धन के भंडार भरना और किसी के साथ दुर्भाग्य न करना। बोलो शुक्र देव महाराज की जय!"


5. तपसी-लपसी की कथा (व्रत पूर्णता हेतु अनिवार्य अनुपूरक कथा)

परंपरागत रूप से कई क्षेत्रों में, विशेषकर जब कोई भी व्रत कथा पढ़ी जाती है, तो उसके अंत में 'तपसी और लपसी' (या विनायक जी की कथा) का श्रवण अनिवार्य माना जाता है ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और कथा खंडित न मानी जाए ।

पारंपरिक प्रसंग: यह कथा इस बात को प्रमाणित करती है कि केवल तपस्या या व्रत पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके साथ दान, धर्म और कथा का श्रवण भी आवश्यक है。

मुख्य कथा:

एक समय की बात है, दो ब्राह्मण थे - एक तपसी (जो केवल तपस्या करता था) और दूसरा लपसी (जो भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करता था)। लपसी रोज सवा शेर की लापसी (हलवा) बनाता, भगवान को भोग लगाता, घंटी बजाता और उसे ग्रहण करता。

एक दिन देवर्षि नारद जी वहाँ पर आए। दोनों ब्राह्मण नारद जी से पूछने लगे, "हे देवर्षि! बताइए हम दोनों में से बड़ा कौन है?" नारद जी बोले, "तुम दोनों खड़े हो जाओ।" दोनों खड़े हो गए ।

जैसे ही दोनों खड़े हुए, तपसी के पैर के नीचे से एक अंगूठी (सिक्का) निकली जो उसने तपस्या करते समय लालचवश अपने पैर के नीचे छुपा ली थी। नारद जी तपसी से बोले, "तूने इतनी तपस्या कर ली, पर तेरे मन का लालच अभी तक नहीं गया। जा, अब तुझे तेरी तपस्या का कोई फल नहीं मिलेगा।"

इतना सुनना था कि तपसी जोर-जोर से रोने लगा। वह रोते-रोते नारद जी के पैरों में गिर गया और बोला, "महाराज! दया करो और बताओ कि मुझे मेरी तपस्या का फल कैसे मिलेगा?"

तब नारद जी ने उसे धर्म का मर्म समझाते हुए कहा, "जो मनुष्य अपने घर में पहली रोटी गाय और कुत्ते के लिए नहीं बनाएगा, तो उसकी तपस्या का फल तुझे मिल जाएगा। जो संध्या के समय दीपक जलाकर हाथ नहीं जोड़ेगा, उसका फल तुझे मिलेगा। जो ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा नहीं देगा, या जो साड़ी देकर भेंट नहीं देगा, उसकी तपस्या का फल तुझे मिल जाएगा। और सबसे महत्वपूर्ण, जो व्यक्ति सारी कथा-कहानी कहकर तेरी यह कहानी नहीं कहेगा, तब उसके सारे पुण्य और सारे फल तुझे मिल जाएँगे।"

इसीलिए यह मान्यता है कि सभी कथा-कहानियों के साथ अंत में तपसी-लपसी की यह कहानी अवश्य सुननी चाहिए, अन्यथा किसी भी कथा या कहानी का फल प्राप्त नहीं होता और वह फल तपसी को चला जाता है ।

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