विस्तृत उत्तर
आदित्य हृदय स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड (सर्ग 105) में वर्णित है। अगस्त्य ऋषि ने रणभूमि में थके और चिंतित श्रीराम को रावण पर विजय हेतु यह स्तोत्र बताया। राम ने तीन बार जप कर रावण का वध किया।
किन परिस्थितियों में पाठ करें
1विजय/सफलता हेतु (मूल उद्देश्य)
- ▸परीक्षा, साक्षात्कार, प्रतियोगिता से पूर्व।
- ▸व्यापार/नौकरी में बड़ा निर्णय।
- ▸कोर्ट केस, विवाद, प्रतिद्वंद्विता।
2कठिन परिस्थिति/संकट
अगस्त्य (श्लोक 25): 'विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में, भय के अवसर पर — सूर्य का कीर्तन करने वाला दुःख नहीं भोगता।'
3निराशा/हताशा
राम स्वयं 'युद्धपरिश्रान्तं' (थके) और 'चिन्तया स्थितम्' (चिंतित) थे — तब यह स्तोत्र दिया गया। अतः मानसिक थकान, निराशा, हताशा में।
4सूर्य ग्रह शांति
कुण्डली में सूर्य कमजोर हो, आत्मविश्वास की कमी, पिता संबंधी समस्या — सूर्य शांति हेतु।
5स्वास्थ्य
नेत्र रोग, हृदय रोग, हड्डी रोग (सूर्य संबंधित)।
पाठ विधि
- ▸सूर्योदय के समय सूर्य की ओर मुख कर पाठ।
- ▸तीन बार पाठ = मूल विधि (अगस्त्य: 'एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा')।
- ▸रविवार विशेष।
- ▸30 श्लोक, 6 भाग।
- ▸बिना दीक्षा सभी पढ़ सकते हैं।





