विस्तृत उत्तर
यह प्रक्रिया उस रत्न को एक जड़ वस्तु से 'जीवित' या 'चैतन्य' स्वरूप में परिवर्तित कर देती है।
अब वह रत्न केवल ग्रह की रश्मियों को आकर्षित नहीं करता, बल्कि स्वयं अधिष्ठात्री देवी की कृपा का एक शक्तिशाली माध्यम बन जाता है।
जब तीनों का (दिव्य पदार्थ, दिव्य ध्वनि और दिव्य भाव का) संगम होता है, तब वह एक सिद्ध कवच, एक दैवीय यंत्र और अपने इष्ट देवी का निरंतर आशीर्वाद प्रदान करने वाला एक जीवंत माध्यम बन जाता है।





