विस्तृत उत्तर
शुद्धिकरण के पश्चात् रत्न को एक स्वच्छ आसन पर स्थापित किया जाता है। फिर धारणकर्ता अपने गोत्र, नाम और मनोकामना का संकल्प लेकर उस रत्न से संबंधित ग्रह की अधिष्ठात्री देवी के मंत्र का 108 बार जाप करता है।
रत्न अभिमंत्रण में संकल्प कैसे लेते हैं को संदर्भ सहित समझें
रत्न अभिमंत्रण में संकल्प कैसे लेते हैं का सबसे सीधा सार यह है: रत्न अभिमंत्रण में धारणकर्ता अपने गोत्र, नाम और मनोकामना का संकल्प लेकर अधिष्ठात्री देवी के मंत्र का 108 बार जाप करता है।
अभिमंत्रण और प्राण प्रतिष्ठा जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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रत्न अभिमंत्रण में मंत्र कितनी बार जपते हैं?
रत्न अभिमंत्रण में अधिष्ठात्री देवी के मंत्र का 108 बार जाप करते हैं — प्रत्येक उच्चारण के साथ देवी की प्राण-शक्ति रत्न में स्थापित होती जाती है।
रत्न अभिमंत्रण क्या होता है?
अभिमंत्रण में रत्न को स्वच्छ आसन पर स्थापित करके संकल्प लेकर अधिष्ठात्री देवी का मंत्र 108 बार जपते हैं — प्रत्येक उच्चारण से देवी की प्राण-शक्ति रत्न में स्थापित होकर उसे जड़ से चैतन्य बनाती है।
बिना प्राण प्रतिष्ठा के रत्न धारण करने से क्या होता है?
बिना शुद्धि और प्राण प्रतिष्ठा के रत्न धारण करना शास्त्र सम्मत नहीं — बिना इसके वह चैतन्य उपकरण नहीं, केवल एक सुंदर पत्थर ही रहता है।
अभिमंत्रण के बाद रत्न में क्या बदलाव आता है?
अभिमंत्रण के बाद रत्न जड़ वस्तु से 'चैतन्य' बन जाता है — वह ग्रह-रश्मि आकर्षण से बढ़कर देवी कृपा का शक्तिशाली माध्यम, सिद्ध कवच और दैवीय यंत्र बन जाता है।
रुद्राभिषेक का संकल्प कैसे लेते हैं?
संकल्प: दाहिने हाथ में जल-अक्षत-कुशा-पुष्प-मुद्रा लेकर ब्रह्मांडीय समय (कल्प-मन्वंतर-युग) + अपना गोत्र-नाम-देश + अपनी मनोकामना बोलकर संकल्प मंत्र का उच्चारण करें। जल भूमि पर छोड़ दें।
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