विस्तृत उत्तर
तर्पण की विधि शास्त्रों में अत्यंत सूक्ष्म रूप से वर्णित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार कर्ता अंजलि में शुद्ध जल, कुशा, और काले तिल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करता है। तर्पण करते समय जल को अंगूठे के मूल भाग से गिराया जाता है, जिसे पितृ तीर्थ कहा जाता है। इस समय तस्मै स्वधा नमः मंत्र का उच्चारण शास्त्र-विहित है।
तर्पण की विधि में कई चरण होते हैं। पहला चरण है सामग्री लेना, जिसमें शुद्ध जल, कुशा और काले तिल तीनों को अंजलि में लेना होता है। दूसरा चरण है दिशा का निर्धारण, अर्थात् दक्षिण दिशा की ओर मुख करना अनिवार्य है। तीसरा चरण है गोत्र-नाम का उच्चारण, जिसमें पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण स्पष्ट और श्रद्धापूर्वक किया जाता है। चौथा चरण है जल कहाँ से गिराना है, अर्थात् अंगूठे के मूल भाग से, जिसे पितृ तीर्थ कहते हैं। पाँचवाँ चरण है मंत्र का उच्चारण, अर्थात् तस्मै स्वधा नमः, जो शास्त्र-विहित मंत्र है।
तर्पण की पूर्व-तैयारी में कर्ता की शुद्धि अत्यंत महत्वपूर्ण है। कर्ता को स्नान करना चाहिए, श्वेत धोती धारण करनी चाहिए, अनामिका में पवित्री पहननी चाहिए, और जनेऊ अपसव्य अवस्था में रखना चाहिए। स्थान के लिए दक्षिण दिशा में बैठना चाहिए और स्थान शुद्ध होना चाहिए। तर्पण कब करें तो रौहिण मुहूर्त 12:44 से 01:34 तक सर्वोत्तम है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार कुतुप के बाद का यह समय तर्पण के लिए उत्तम है।
तर्पण में अंजलि का महत्व यह है कि दोनों हाथ जोड़कर बनाया गया कुंड अंजलि कहलाता है, और यह पवित्र आधार है जिसमें सामग्री रखी जाती है। पितृ तीर्थ क्या है तो यह अंगूठे का मूल भाग है, जो शास्त्रों में अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है, और वहाँ से गिराया जल सीधा पितरों तक पहुँचता है। तस्मै स्वधा नमः मंत्र शास्त्र-विहित है, जिसका अर्थ है उन्हें पितरों को स्वधा नमस्कार है, और स्वधा का अर्थ है पितरों का विशेष आहार या अर्पण।
तर्पण के अंगों का सम्पूर्ण क्रम इस प्रकार है। पहले कर्ता शुद्ध होकर अपसव्य अवस्था में बैठता है। फिर दक्षिण दिशा में मुख करता है। फिर अंजलि में शुद्ध जल, कुशा और काले तिल लेता है। फिर पितरों के गोत्र-नाम का उच्चारण करता है। फिर अंगूठे के मूल भाग पितृ तीर्थ से जल गिराता है। साथ-साथ तस्मै स्वधा नमः मंत्र का उच्चारण करता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया तर्पण कहलाती है। हर चरण का एक विशिष्ट उद्देश्य है, और सब मिलकर पितरों तक तर्पण पहुँचाते हैं। कोई भी चरण छूटा तो तर्पण अधूरा रह जाता है। तर्पण का उद्देश्य पितरों की प्यास बुझाना, तृप्ति प्रदान करना, और आशीर्वाद प्राप्त करना है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। तर्पण श्राद्ध का जल-यज्ञ है, और हर सूक्ष्म चरण का अपना आध्यात्मिक महत्व है। निष्कर्षतः तर्पण की विधि में कर्ता अंजलि में शुद्ध जल, कुशा और काले तिल लेकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख कर, पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए, अंगूठे के मूल भाग पितृ तीर्थ से जल गिराता है, साथ-साथ तस्मै स्वधा नमः मंत्र का उच्चारण करता है।
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