विस्तृत उत्तर
तर्पण में जल अंगूठे के मूल भाग से गिराया जाता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार तर्पण करते समय जल को अंगूठे के मूल भाग से गिराया जाता है, जिसे पितृ तीर्थ कहा जाता है।
जल गिराने के स्थान का विवरण देखें तो यह अंगूठे का मूल भाग है। अंगूठे का मूल भाग का अर्थ है अंगूठे की जड़ का हिस्सा, अर्थात् वह स्थान जहाँ अंगूठा हथेली से जुड़ता है। इस स्थान को शास्त्रों में पितृ तीर्थ का विशेष नाम दिया गया है, अर्थात् पितरों का पवित्र तीर्थ।
जल गिराने की विधि में कई बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली बात यह है कि कर्ता अंजलि में शुद्ध जल, कुशा और काले तिल लेता है। दूसरी बात यह है कि वह दक्षिण दिशा की ओर मुख करता है। तीसरी बात यह है कि वह पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करता है। चौथी बात यह है कि वह जल को पितृ तीर्थ अर्थात् अंगूठे के मूल भाग से धीरे-धीरे गिराता है। साथ-साथ वह तस्मै स्वधा नमः मंत्र का उच्चारण करता है।
इस विधान का कारण यह है कि अंगूठे का मूल भाग शास्त्रों में अत्यंत पवित्र स्थान माना गया है। यहाँ से गिराया गया जल सीधे पितरों तक पहुँचता है, क्योंकि यह पितरों के लिए विशेष द्वार है। यह स्थान पितृ तीर्थ कहलाता है, क्योंकि पितृ का अर्थ पितर और तीर्थ का अर्थ पवित्र स्थान है।
हाथ की अन्य अंगुलियों और भागों के भी अपने विशेष उद्देश्य होते हैं। पवित्री अनामिका अंगुली में पहनी जाती है, जो कर्ता की शुद्धता का प्रतीक है। परंतु जल केवल अंगूठे के मूल भाग से ही गिराया जाता है, क्योंकि वही पितृ तीर्थ है। यह सूक्ष्म नियम सिद्ध करता है कि शास्त्रों ने हर अंगुली और उसके भाग का विशेष उद्देश्य निर्धारित किया है, और हर भाग का अपना आध्यात्मिक महत्व है। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। निष्कर्षतः तर्पण में जल अंगूठे के मूल भाग से गिराया जाता है, जिसे पितृ तीर्थ कहा जाता है। यह पितरों के लिए विशेष पवित्र स्थान है, और यहाँ से गिराया गया जल सीधे पितरों तक पहुँचता है।
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