विस्तृत उत्तर
व्रत का अर्थ केवल उपवास नहीं है — 'व्रत' शब्द का मूल अर्थ है 'संकल्प'। व्रत एक आंतरिक प्रतिज्ञा है जो बाहरी नियमों से प्रकट होती है।
मनोकामना पूरी न होने के संभावित कारण:
व्रत का भाव — व्रत यदि केवल 'सौदे' की तरह हो — 'मैं व्रत रखूँगा तो तुम मेरी इच्छा पूरी करो' — यह भक्ति नहीं, यह व्यापार है। भगवान को भाव चाहिए, सौदा नहीं।
व्रत के नियमों में त्रुटि — प्रत्येक व्रत के विशेष नियम होते हैं — किस समय व्रत खोलें, क्या खाएँ, क्या न खाएँ, कौन से मंत्र बोलें। इनमें कोई भूल व्रत का फल कम कर सकती है।
मनोकामना का स्वरूप — जो माँगा जा रहा है वह यदि प्रकृति के नियम के विरुद्ध हो या किसी को नुकसान पहुँचाने वाला हो — तो भगवान उसे पूरा नहीं करते।
प्रारब्ध — कुछ इच्छाएँ कर्म के बोझ के कारण तुरंत पूरी नहीं होतीं।
व्रत का वास्तविक फल — व्रत से सबसे पहले जो मिलता है वह है — मन की साधना, इंद्रिय-निग्रह, एकाग्रता और संकल्प-शक्ति। ये बड़े फल हैं। सांसारिक मनोकामना इसके बाद आती है।
स्वयं का आचरण — यदि व्रत के दिन पवित्र रहें और बाकी दिनों में अनियंत्रित जीवन जीएँ — तो व्रत का पूर्ण प्रभाव नहीं होता।
उपाय — व्रत में भाव शुद्ध रखें, नियमों का पालन करें और परिणाम भगवान पर छोड़ दें। निरंतरता रखें।

